मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context११६ मनुस्मृति । न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन । अजिह्यामशठां शुद्धां जीवेद्ब्राह्मणजीविकाम् ॥ ११॥ सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् । सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥ १२ ॥ अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः । स्वर्ग्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत् ॥ १३ ॥ जो ब्राह्मण उञ्छवृत्ति से जीविका चलाता हो उसको सदा अग्निहोत्र में तत्पर रहना चाहिए। और अमा, पूर्णा की इष्टि आदि सहज यज्ञ करना चाहिए। जीविका के लिए दुनियादारी में ज्यादा न फँसना चाहिए अर्थात् झूठी बड़ाई खुशामद वगैरह न करे, किन्तु शुद्ध, निष्कपट बर्ताव रक्खे और बनियों की नौकरी न करके पवित्र ब्राह्मण के सम्बन्ध में जीविका करनी चाहिए। सुख चाहने वालों को चाहिए कि सन्तोषवृत्तिको रखकर जो मिले उसीमें निर्वाह करे अधिक माया में न फँसे–सन्तोष सुखका मूल और असन्तोष दुःखका मूल है। इसलिए ऊपर कही किसी एक जीविका के सहारे सुख से काल बितावे और आगे कहे हुए व्रतों का पालन किया करे ॥ १०–१३ ॥ वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १४ ॥ नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा । न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः ॥ १५ ॥ इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः । अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा संनिवर्तयेत् ॥ १६ ॥ ब्राह्मण को अपने वेदोक्त कर्मका आचरण नित्य निरालस होकर करना चाहिए। उसको भरशक करने से परमगति को पुरुष प्राप्त