मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context११८ मनुस्मृति। वाच्येके जुह्वति प्राणं प्राणे वाचं च सर्वदा। वाचि प्राणे च पश्यन्तो यज्ञनिर्वृत्तिमक्षयाम् ॥ २३ ॥ ज्ञानेनैवापरे विप्रा यजन्त्येतैर्मखैः सदा। ज्ञानमूलां क्रियामिषां पश्यन्तो ज्ञानचक्षुषा ॥ २४ ॥ पुरुष जैसे जैसे शास्त्रको देखता जाता है वैसे वैसे उसको ज्ञान होता है और उसकी प्रीति बढ़ती है। स्नातक ब्राह्मण को, वेदाध्ययन, होम, भूतबलि, अतिथिसत्कार और श्राद्ध जहांतक होसके छोड़ना न चाहिए। बहुत से यज्ञविषय के ज्ञाता पुरुष इन पाँच महायज्ञों को न करके इन्द्रियों को ही अग्निरूप मानकर उसीमें विषयों का होम करते हैं अर्थात् इन्द्रियों के बाहरी विषयों को अपने वश में करने का उपाय किया करते हैं । कितने ही ज्ञानी पुरुष वाणी का प्राण में और प्राण में वाणी का लय करते हैं। दूसरे लोग ज्ञानयज्ञ से ही सब यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं क्योंकि ज्ञानही सब यज्ञों का मूल है ॥ २०--२४ ॥ अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते द्युनिशोःसदा। दर्शेन चार्धमासान्ते पौर्णमासेन चैव हि ॥ २५ ॥ सस्यान्ते नवसस्येष्ट्या तथर्त्वन्ते द्विजोऽध्वरैः। पशुना त्वयनस्यादौ समान्ते सौमिकैर्मखैः ॥ २६ ॥ प्रातःकाल और सायंकाल में अग्निहोत्र, अमावास्या को दर्श- नामक यज्ञ और पूर्णिमा को पौर्णमासयज्ञ ज़रूर करना चाहिए। पहला अन्न हो चुके और नया अन्न पैदा हो तब शरद् ऋतु में नवीन अन्न से इष्टि करे और प्रत्येक ऋतु के अन्त में चातुर्मास यज्ञ करे, उत्तरायण-दक्षिणायन के आरम्भ में पशुयाग और वर्ष पूरा होने पर वसन्तऋतु में सोमयाग को करना चाहिए ॥२५-२६॥ तानिष्ट्वा नवसस्येष्ट्या पशुना चाग्निमान् द्विजः। नवान्नमद्यान्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥ २७ ॥