मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 307 of 649
Read in contextपाँचवाँ अध्याय । १६७ यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः स्वयमेव स्वयम्भुवा । यज्ञस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः ॥ ३९ ॥ ओषध्यः पशवो वृक्षास्तिर्यञ्चः पक्षिणस्तथा । यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युत्सृतीः पुनः ॥ ४० ॥ मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवतकर्मणि । अत्रैव पशवो हिंस्या नान्यत्रेत्यब्रवीन्मनुः ॥ ४१ ॥ विना देवनििमित्त के जो वृथा पशुहिंसा करता है, वह मरने पर जितने पशुरोम हैं, उतने जन्मों तक उस पशु के हाथ से मारा जाता है । ब्रह्मा ने स्वयं ही यज्ञ के लिए पशुओं को बनाया है और सब यज्ञ जगत् के कल्याण के लिए हैं, इसलिए यज्ञ में जो पशुवध होता है वह वध नहीं है । ओषधि, पशु, वृक्ष, पक्षी आदि यज्ञ के अर्थ मारे जाने से उत्तम गति को पाते हैं । मधुपर्क, यज्ञ, श्राद्ध और दैवकर्म में पशुवध करना, दूसरे कामों में न करना यह मनु जी की आज्ञा है ॥ ३८-४१ ॥ एष्वर्थेषु पशून् हिंसन् वेदतत्त्वार्थविद्द्विजः । आत्मानं च पशुं चैव गमयत्युत्तमां गतिम् ॥ ४२ ॥ गृहे गुरावरण्ये वा निवसन्नातवान् द्विजः । नावेदविहितां हिंसामापद्यपि समाचरेत् ॥ ४३ ॥ या वेदविहिता हिंसा नियताऽस्मिंश्चराचरे । अहिंसामेव तां विद्याद्वेदाद्धर्मो हि निर्बभौ ॥ ४४ ॥ योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया । स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ॥ ४५ ॥ वेदविशारद् द्विज, मधुपर्क आदि में पशुवध करके अपनी आत्मा और पशु को उत्तम गति को पहुँचाता है । गृहस्थ, ब्रह्मचर्य