मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३० मनुस्मृति । के अङ्गोपाङ्ग, वेद के शब्दार्थरूप शरीर के परिचायक-प्रदर्शक- बोधक माने जाते हैं । जैसे किसी पाठ्य के देवदत्तआदि बोधक हैं; किंवा किसी दृश्य के सौर आदि प्रकाश प्रकाशक हैं। और जैसे देवदत्त के अभाव में यज्ञदत्त आदि तथा सौर प्रकाश के अभाव में आग्नेय-प्रकाश आदि कार्य के साधक हैं, वैसेही कालवश अङ्गोपाङ्ग के नष्ट हो जाने पर दूसरे अङ्गोपाङ्ग वेद के सहायक होते हैं । इससे स्पष्ट है कि अङ्गोपाङ्ग के अधि- कार नित्य हैं और वे स्वरूप से अनित्य हैं और वेद तो स्वरूप से भी नित्य है । इसीलिये वेद का नाम श्रुति है ‘ श्रूयते गुरुपरम्परया, न तु केनचित् क्रियते इति श्रुतिः ’ जो गुरुपरम्परा से सुनी जावै और बनाई न जावै वह श्रुति है । और अङ्गोपाङ्ग का साधारण नाम स्मृति है ‘स्मर्यते इति स्मृतिः’ जो वेदार्थानुकूल स्मरण की जावै वह स्मृति है । स्मरण के न्यूनाधिक भाव से ही स्मृतियों के प्रामाण्य में न्यूनाधिक भाव माना गया है इसीलिये वृहस्पति ने कहा है— ‘ वेदार्थोपनिबन्धत्वात्प्राधान्यं हि मनोःस्मृतम् । मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥ ’ वेदार्थ के संकलन करने से मनु का प्राधान्य है और मनुस्मृति से विरुद्ध जो कोई स्मृति है वह प्रशंसनीय नहीं है । यहां यद्यपि मनुस्मृति सजातीय स्मृतियों के लक्ष्य से यह बृहस्पति का वचन है तोभी वलावल विचार से यथासंभव अङ्ग और उपाङ्ग भर में प्रामाण्य का न्यूनाधिक भाव मानना पड़ता है। और यह स्मरण रहे कि अङ्ग और उपाङ्ग की संज्ञा वलावल विचार में प्रयोजनीय नहीं है, वह वैदिक शब्दार्थ शरीर के अनुसार की गई है ।