मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१८२ मनुस्मृति । अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ १२७ ॥ आपः शुद्धा भूमिगता वैतृष्णं यासु गोर्भवेत् । अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ॥ १२८ ॥ नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्ये यच्च प्रसारितम् । ब्रह्मचारिगतं भैक्षं नित्यं मेध्यमिति स्थितिः ॥ १२६ । नित्यमास्यं शुचिः स्त्रीणां शकुनिः फलपातने । प्रस्रवे च शुचिर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ १३० ॥ श्वभिर्हतस्य यन्मांसं शुचि तन्मनुरब्रवीत् । क्रव्याद्भिश्च हतस्यान्यैश्चाण्डालाद्यैश्च दस्युभिः॥१३१॥ जिस मृत्पात्र में मद्य-मल-चरबी आदि का संपर्क होजाता है उसका पुनः अग्निसंस्कार करने पर भी वह शुद्ध नहीं होता। झाडू देना, लीपना, जल छिड़कना, खोदना और गौ का निवास इन पांच प्रकारों से भूमि पवित्र होती है। पक्षी का खाया, गौ का सूंघा, पैर से दवा और जिसके ऊपर छींक दिया हो, जहां बाल या कीड़ा पड़ा हो ऐसा स्थान मिट्टी डालने से पवित्र होता है । जब तक पदार्थों से अपवित्र वस्तु का गंध या लेप दूर न हो तबतक उन पदार्थों को मिट्टी और जल से शुद्ध करे। देवताओं ने ब्राह्मणों के तीन पदार्थ पवित्र कहे हैं—एक अदृष्ट, दूसरा जो पानी से धो लिया हो, तीसरा जिसको ब्राह्मणों ने वाणी से पवित्र कहा हो। जिस जल में गौ की प्यास दूर होजाय, पवित्र हो, गन्ध, रस और वर्ण से ठीक हो, ऐसा पानी भूमि में शुद्ध होता है । कारी- गर का हाथ, जो पदार्थ बाज़ार में बेंचने को रक्खे हों और ब्रह्मचारी की भिक्षा ये सदा पवित्र होते हैं। रतिसमय में स्त्रियों का मुख, फल गिराने में पक्षीका चोंच, दूध निकालते समय बछड़ा का मुख और शिकार में कुत्ता का मुख पवित्र माना गया है । कुत्ता के मारे हुए का मांस पवित्र होता है । और मांसाहारी पशु, चाण्डाल