मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 329 of 649
Read in contextपाँचवां अध्याय । १८६ पाती है और मरकर शृगाल की योनि में जन्म लेती है । पाप रोग कोढ़ वगैरह से पीड़ित होती है। और जो स्त्री शरीर, वाणी और मन को वश में रखकर पतिसेवा करती है। वह पतिलोक पाती है और संसार में पतिव्रता कहलाती है। मन, वाणी और शरीर से नियम और सदाचार से रहनेवाली स्त्री उत्तम कीर्ति और स्वर्ग पाती है ॥ १६३-१६६ ॥ एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् । दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् ॥ १६७ ॥ भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाग्नीनन्त्यकर्मणि । पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च ॥ १६८ ॥ अनेन विधिना नित्यं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् । द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ १६६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इस प्रकार साध्वी, सवर्णा स्त्री पति से पूर्व मर जाय तो उसका दाह अग्निहोत्र की अग्नि और यज्ञपात्रों के साथ करना चाहिए। पति से पूर्व स्त्रीका मरण होने पर, उसकी अन्त्येष्टि क्रियापूर्वक दाह देकर, फिर विवाह करके, स्मार्ताग्नि या श्रौताग्नि का धारण करना चाहिए। द्विजातियों को उक्त विधि के अनुसार, नित्य पञ्चमहायज्ञ करना और विवाह करके आयु का दूसरा भाग गृहस्थाश्रम में बिताना चाहिए ॥ १६७-१६६ ॥ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।