मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२०६ मनुस्मृति। नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ ९५ ॥ एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः । संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ ९६ ॥ एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः । पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्मं निबोधत ॥ ९७ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां षष्ठोऽध्यायः ॥ ऋषि, देव और पितरों के ऋण से मुक्त होकर, दशलक्षण धर्म का सेवन करता हुआ द्विज वेदान्त को सुनकर संन्यास धारण करे। सब अग्निहोत्रादि कर्मों को छोड़कर, पापों का प्राणायाम से नाश करके, जितेन्द्रिय होकर वेद का अध्ययन करे और पुत्रों के दिये भोजन, वस्त्रादि का सुख से उपभोग करे। इस प्रकार, सब कर्मों को छोड़कर, केवल आत्मसाक्षात्कार में तत्पर रहकर, संन्यास धारण करने से ब्रह्मपद को पहुँचता है। यह पवित्र और परलोक में अक्षय फल देनेवाला ब्राह्मण का चारों प्रकार का धर्म कहा गया है। अब राजधर्म को सुनो ॥ ९४-९७ ॥ छठवां अध्याय पूरा हुआ।