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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 35 of 649

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Page 35

भूमिका । ३३ ‘ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ ’ बड़ी अवस्था होने से या बाल पकने से या धनवान् होनेसे या सुयोग्य बान्धवों से महत्त्व नहीं प्राप्त होता है। ऋषियों ने नियम किया है कि जो अनूचान ( साङ्गवेद का अध्येता ) है वही हमारे महान् है। कालवश जब क्षत्रियसम्म्राट् का अभाव हुआ, वर्णाश्रम की शिक्षाप्रणाली शिथिल होगई, वैदिक शुद्धज्ञान लुप्तप्राय होगया; तभी से वर्णाश्रमव्यवस्था में चलनेवाले मनुष्यों की वृत्तियां बदल गईँ, नानाप्रकार की धार्मिकशिक्षा चलपड़ीं, ब्राह्मण धर्म- ध्वज बन गये, मनमानी धार्मिक व्यवस्थाएं करने लगे, अपने अपने मतों के पुष्टि के लिये श्रुति स्मृतियों के यथेष्ट व्याख्यान होने लगे, ग्रन्थों में नानाविध वाक्य मिला दिये गये, श्रुति स्मृति के नाम से कितने एक नवीन ग्रन्थ बना डाले गये, यहां तक, कि कईएक स्थलों में आर्ष और पौरुष विवेक संदेह- सागर में डूब गया। काल की महिमा है कि जो व्याकरण-न्याय वेदार्थ की रक्षा के लिये पढ़े पढ़ाये जाते थे, जिनके बदौलत वेद के शब्द और अर्थ से शरीर में किसी प्रकार की भी पीड़ा नहीं पहुँ- चती थी वही ( व्याकरण-न्याय ) अब विपरीतभाव के लिये उपस्थित किये कराये जाते हैं। व्याकरण-भाष्य में वारंवार दिखलाया है कि वेदों के रक्षार्थ व्याकरण है। परंतु अब वेदों का मनमाना अर्थ करने के लिये व्याकरण-चीर तयार किया जाता है। और न्यायदर्शन में कहा है कि तत्त्वनिर्णय