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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 358

२१८ मनुस्मृति। आकारमिङ्गितं चेष्टां भृत्येषु च चिकीर्षितम् ॥ ६७॥ बुद्ध्वा च सर्वं तत्त्वेन परराजचिकीर्षितम् । तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथात्मानं न पीडयेत् ॥ ६८ ॥ और दूत उसको रक्खे जो बहुश्रुत हो और हृदय के भाव, आ- कार, चेष्टाओं को जानने वाला, अन्तःकरण का शुद्ध, चतुर और कुलीन हो। शत्रु का भी प्रेमपात्र, आचारपवित्र, कार्यकुशल, पूर्वापर बातों का स्मरण रखनेवाला, देश-कालज्ञाता, सुन्दर, निर्भय और वाचाल राजा का दूत प्रशंसा के लायक होता है। मन्त्री के अधीन दण्ड और दण्ड के अधीन शिक्षा है। राजा के अधीन देश और खज़ाना है और दूत के अधीन मेल या बिगाड़ रहता है। दूत ही आपस के शत्रुओं को मिलाता है और मिले हुए को अलग़ाता है। दूत वह काम करता है जिससे मनुष्य लड़कर जुदा होजाते हैं। दूत शत्रु के आकार, मनोभाव, और चेष्टाओं से उस के लिये अभिप्राय को जाने। दूत द्वारा शत्रु की सब चालों को ठीक ठीक जानकर, राजा ऐसा उपाय करे, जिससे वह शत्रु राजा कोई पीड़ा न देसके ॥ ६३-६८ ॥ जाङ्गलं सस्यसम्पन्नमार्यप्रायमनाविलम् । रम्यमानतसामन्तं स्वाजीव्यं देशमावसेत् ॥ ६६ ॥ धन्वदुर्गं महीदुर्गमब्दुर्गं वार्क्षमेव वा । नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम् ॥ ७० ॥ जहां जङ्गल हो, खेती अच्छी हो, शिष्ट पुरुष बसते हों, रोगादि उपद्रवों से रहित हो, देखने में सुन्दर हो, आसपास के मनुष्य अदब रखते हों, ऐसे स्वाधीन देश में राजा को रहना चाहिए। धनुदुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, सेनादुर्ग वा गिरिदुर्ग इन दुर्ग- क़िलाओं में किसीके आश्रय में नगर वसाना चाहिए ॥ ६६-७० ॥ सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत् ।