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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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२३६ मनुस्मृति। अत्युच्छ्रितं तथात्मानं तदा कुर्वीत विग्रहम् ॥ १७० ॥ यदा मन्येत भावेन हृष्टं पुष्टं बलं स्वकम् । परस्य विपरीतं च तदा यायाद्रिपुं प्रति ॥ १७१ ॥ यदा तु स्यात्परिक्षीणो वाहनेन बलेन च । तदासीत प्रयत्नेन शनकैः सान्त्वयन्नरीन् ॥ १७२ ॥ मन्येतारिं यदा राजा सर्वथा बलवत्तरम् । तदा द्विधा बलं कृत्वा साधयेत् कार्यमात्मनः ॥ १७३ ॥ जब भविष्य में अपनी उन्नति की आशा हो तब शत्रु से कुछ पीड़ित होकर भी सन्धि कर लेवे। जब अपने राजमण्डल को खूब प्रसन्न जाने और अपनी शक्ति को पूर्ण देखे, तब वैरी के साथ युद्ध करे। जब अपनी सेना को मन से प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट समझे और शत्रु की सेना को साधारण दशा में जाने, तब युद्ध की तैयारी करे। जब हाथी, घोड़ा आदि वाहन और सेना से क्षीण हो तब यत्नपूर्वक शान्ति से, शत्रु को समझा कर शान्त होकर रहे अर्थात् लड़ाई में न लगे। और जब, राजा अपने शत्रु को सर्वथा बलवान् जाने, तब आधी सेना लड़ाई पर भेज दे और आधी अपने साथ में रखकर कार्यसाधन में लगे ॥ १६६-१७३ ॥ यदा परबलानां तु गमनीयतमो भवेत् । तदा तु संश्रयेत्क्षिप्रं धार्मिकं बलिनं नृपम् ॥ १७४ ॥ निग्रहं प्रकृतीनां च कुर्याद्योऽरिखलस्य च । उपसेवेत तं नित्यं सर्वयत्नैर्गुरुं यथा ॥ १७५ ॥ यदि तत्रापि संपश्येद्दोषं संश्रयकारितम् । सुयुद्धमेव तत्रापि निर्विशङ्कः समाचरेत् ॥ १७६ ॥