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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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२४४ , मनुस्मृति । तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः । सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रैर्विषापहैः ॥ २१७ ॥ विषघ्नैरुदकैश्चास्य सर्वद्रव्याणि योजयेत् । विषघ्नानि च रत्नानि नियतो धारयेत्सदा ॥ २१८ ॥ सब आपत्तियों को एक साथ आतीं देख पड़ें तो बुद्धिमान् राजा साम दान आदि उपायों को एक साथ वा अलग अलग काम में लावे । उपाय करनेवाले, उपाय के साधन योग्य और उपाय इन तीनों को ठीक ठीक आश्रय करके अर्थसिद्धि के लिए उपाय करे । उक्त प्रकार से संपूर्ण राजकार्यों का मन्त्रियों के साथ विचार करे । स्नान और व्यायाम (कसरत) करके दोपहर में भोजनार्थ अन्तःपुर में प्रवेश करे । वहां नम्र, भोजन- काल को जाननेवाला, शत्रु के बहकाने में न आनेवाला, रसोइयां के तैयार किये, परीक्षित और विषनिवारक मन्त्रों से शुद्ध भोजन को करे । राजा के सब खानेवाले पदार्थों में विषनाशक दवा डाले और विषनाशक रत्नों को राजा सदा धारण करे ॥ २१४–२१८॥ परीक्षिताभिः स्त्रीभिश्चैनं व्यजनोदकधूपनैः । तो लेषाभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ॥ २१९ ॥ राजा दबा उसको इस एवं कुर्वीत यानशय्यासनाशने । देखकर, मित्र या ने चैव सर्वालङ्कारकेषु च ॥ २२० ॥ करे जिसमें ये दोनों वेष-भूषणों से सजी धजी स्त्रियां, एकाग्रमन पाकर वैसा नहीं चढ़ धूप-गन्ध से राजा की सेवा करें । इसी भांति बढ़ता है ॥ २०६-२०८ या, आसन, भोजन, स्नान, उबटन और सब धर्मज्ञं च कृतज्ञं च क्षा आदि कर्म होना चाहिए ॥ २१९-२२० ॥ अनुरक्तं स्थिरारम्भं स्त्रीभिरन्तःपुरे सह । । पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ॥ २२१ ॥