मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२५२ मनुस्मृति ।
तीन वर्ष के भीतर उसका मालिक आकर कहै कि-यह मेरा धन है, तब राजा उससे ठीक तौर से पूंछे कि धन कैसा है? कितना है? जो वह रूप, रंग, संख्या बतला दे तो उसको दे देना चाहिए। अगर खोई वस्तु का पता ठीक न बता सके तो उस पर उतना ही धन जुर्माना करे। कोई खोई वस्तु उसके मा- लिक को देते समय उसकी रक्षा के कारण उस धन का छठ्ठां, दशवां या बारहवां भाग राजा ले लेवे। किसीकी कोई चीज़ गुम गई हो और मिले तो राजा उसे पहरे में रक्खे और वहां से चुरानेवाला पकड़ा जाय तो उसको हाथी से मरवा देवे। जो पुरुष सच्चाई से कहे कि 'यह निधि मेरा है' उसके निधि* से छठ्ठां वां बारहवां भाग राजा ग्रहण कर लेवे। यदि वह दूसरे का अपना लेने की इच्छा करे तो उस निधि का आठवां भाग अथवा निधि गिनकर उसका कुछ भाग दण्ड देवे ॥ ३१-३६ ॥
विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् । अशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ ३७ ॥ यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ । तस्माद् द्विजेभ्यो दत्त्वार्धमर्धं कोशे प्रवेशयेत् ॥ ३८ ॥
यदि विद्वान् ब्राह्मण पुराने ज़माने की निधि पाजाय तो वह सब ले लेवै। क्योंकि ब्राह्मण सबका स्वामी हैं और जो भूमि में पुरानी निधि राजा पावे तो उसका आधा द्विजों को बाँट दे और आधा अपने खज़ाने में रखवा देवे ॥ ३७-३८ ॥
निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ । अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ ३९ ॥ दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राज्ञा चौरैर्हृतं धनम् । राजा तदुपयुञ्जानश्चौरस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ ४० ॥
- भूमि में गड़ा हुआ पुराना धन 'निधि' कहलाता है।