मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२५४ मनुस्मृति । लियत को खोज लेवे। सत्य का निर्णय करे, अन्याय से खुद डरे और गवाहों के झूठ, सत्य का एवं देश, काल और मामला का विचार करे । सजन पुरुष और धार्मिक द्विज जैसा आचरण करते हों और देश, कुल, जाति के आचार से जो ख़िलाफ़ न हो वैसा फ़ैसला करे ॥ ४४-४६ ॥ अधमर्णार्थसिद्ध्यर्थमुत्तमर्णेन चोदितः । दापयेद्धनिकस्यार्थमधमर्णाद्विभावितम् ॥ ४७ ॥ यैर्यैरुपायैरर्थं स्वं प्राप्नुयादुत्तमर्णिकः । तैस्तैरुपायैः संगृह्य दापयेदधमर्णिकम् ॥ ४८ ॥ धर्मेण व्यवहारेण छलेनाचरितेन च । प्रयुक्तं साधयेदर्थं पञ्चमेन बलेन च ॥ ४६ ॥ यः स्वयं साधयेदर्थमुत्तमर्णोऽधमर्णिकात् । न स राज्ञाभियोक्तव्यः स्वकं संसाधयन् धनम् ॥ ५० ॥ अर्थेऽपह्नवमानं तु करणेन विभावितम् । दापयेद्धनिकस्यार्थं दण्डलेशं च शक्तितः ॥ ५१ ॥ क़र्ज़ा का लेना-देना । अधमर्ण-क़र्ज़दार से अपना क़र्ज़ मिलने के लिए उत्तमर्ण-महा- जन कहे तो उसका धन राजा सबूत लेकर दिला देय । जिन्ह जिन उपायों से महाजन अपना रुपया पासके, उन उपायों से दिलाने की कोशिश करे । महाजन धर्म से, दावा से, कपट से, दबाव से और पाँचवें उचित बलात्कार से अपना धन वसूल करे। यदि महाजन ऋणी से खुद अपना धन वसूल करले तो उसपर राजा कोई अभियोग (मुक़द्दमा) न करे। धनी के धन को क़र्ज़दार न क़बूल करे और महाजन साक्षी-गवाह और लेख