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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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२७८ मनुस्मृति। निक्षेपोपनिधी नित्यं न देयौ प्रत्यनन्तरे । नश्यन्ते विनिपाते तावनिपाते त्वनाशिनौ ॥ १८५ ॥ स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे । न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेतुश्च बन्धुभिः ॥१८६॥ अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम् । विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत् ॥ १८७ ॥ निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्परिसाधने । समुद्रे नाप्नुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ १८८ ॥ चौरैर्हृतं जलेनोढमग्निना दग्धमेव वा । न दद्याद्यदि तस्मात्स न संहरति किंचन ॥ १८६ ॥ निक्षेपस्यापहर्त्तारमनिक्षेप्तारमेव च । सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ॥ १६० ॥ यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते । तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ वा तत्समं दमम् ॥ १६१ ॥ और यदि वह ठीक ठीक न देवे तो राजा पकड़कर दोनों की धरोहर दिलवावे। खुली या मुहर लगी धरोहर या मांगी वस्तु रखनेवाले की वस्तु उसके वारिसों को न देवे, क्योंकि रखनेवाले की मृत्यु होजाने से धरोहर नष्ट हो जाती है। जीता हो तो मिल सकती है। परन्तु धरोहर रखनेवाले की मृत्यु होजाने पर, यदि साहूकार खुशी से उसके वारिसों को दे देय, तो कम देने का दावा वारिस या राजा न चलावे। उस धन को प्रसन्नता से कम ज्यादा का कपट छोड़कर, स्वीकार करले। यही सब धरोहरों का नियम है जोकि बिना मुहर रक्खी गई है और मुहरवाली में कोई शक नहीं होती। अमानत की वस्तु को चोर ले जाय, जल में