मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextआठवां अध्याय । २८१ चीज़ को कुछ खरीद करे और पीछे कोई बखेड़ा उठे तो खरीदार निर्दोष है और उसको वह वस्तु पानी चाहिए। माल का मालिक न होकर बेंचनेवाले को यदि खरीदनेवाला न ला सके पर बहुतों के सामने खरीदना साबित करदे तो दण्ड योग्य नहीं है। और उस खोई वस्तु का मालिक वापस ले सकता है। एक वस्तु दूसरी के रूप में मिलती हो तो उसको दूसरे के धोखे बेंचना ठीक नहीं है और सड़ी, तौल में कम, बिना दिखलाये, अच्छी वस्तु के नीचे खराब ढककर बेंचना अनुचित है ॥ २००-२०३ ॥ अन्यां चेद्दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्या प्रदीयते । उभे ते एकशुल्केन वहेदित्यब्रवीन्मनुः ॥ २०४ ॥ नोन्मत्ताया न कुष्ठिन्या न च या स्पृष्टमैथुना । पूर्वं दोषानभिख्याप्य प्रदाता दण्डमर्हति ॥ २०५ ॥ ऋत्विग् यदि वृतो यज्ञे स्वकर्म परिहापयेत् । तस्य कर्मानुरूपेण देयोऽंशः सहकर्तृभिः ॥ २०६ ॥ दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन् । कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् ॥ २०७ ॥ एक कन्या दिखाकर दूसरी किसी का विवाह करदे तो दोनों का एकही मूल्य में विवाह कर लिया जाय, मनु की आज्ञा है। पागल, कोढ़िन, किसी से भुक्त हो तो न बतलाने से कन्यादान वाला दण्ड योग्य होता है। यज्ञ में वरण किया हुआ ऋत्विक् किसी कारण से अपना कर्म न पूरा करसके तो दूसरों के साथ में उसको भी कर्मानुसार दक्षिणा देवे। सब दक्षिणा दी गई हों और रोगादिवश कर्म छोड़ दे तो दूसरे से पूरा कराले ॥ २०४-२०७॥ यस्मिन्कर्मणि यास्तु स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः । स एव ता आददीत भजेरन् सर्व एव वा ॥ २०८ ॥ ३६