मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२८८ मनुस्मृति । अन्न पशु खालें तो चरवाह को सौ पण दण्ड करे और विना चर- वाह के पशुओं को हाँक देवे। दूसरे खेतों में पशु हानि करे तो चरवाह पर सवां पण दण्ड करे। और खेत के स्वामी की हानि तो सब हालत में देनो ही चाहिए। दश दिन के भीतर की वियाई गो, सांड़ और देवार्पण करके छोड़े हुए पशु खेत खालें तो चर- वाह साथ हो या न हो, दण्ड नहीं होसकता-मनुजी फ़रमाते हैं। यदि खेतवालेही के पशु खेत चरें तो राजा हानि से दश- गुणा दण्ड करे और हलवाहों की भूल से हो तो उसका आधा दण्ड करे। इसभांति पशुओं के स्वामी, पशु और चरवाह के अपराध होनेपर धार्मिक राजा न्याय करे ॥ २३६-२४४ ॥ सीमां प्रति समुत्पन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः । ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ २४५ ॥ सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकान् । शाल्मलीन्सालतालांश्च क्षीरिणश्चैव पादपान्॥२४६॥ सीमा-सरहद् का निर्णय । यदि दो गाँवों के हद का झगड़ा उठे तो जेठ मास में जब ज़मीन साफ़ हो तब उसका निश्चय करना। हद जानने के लिए बड़, पीपल, ढाक, सैमर, साल, ताल और दूधवाले कोई वृक्ष स्थापित करे ॥ २४५-२४६ ॥ गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानि च । शरान् कुब्जक गुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति॥२४७॥ तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवणानि च । सीमासंधिषु कार्याणि देवतायतनानि च ॥ २४८ ॥ उपच्छन्नानि चान्यानि सीमलिङ्गानि कारयेत् । सीमाज्ञाने नृणां वीक्ष्य नित्यं लोके विपर्ययम् ॥ २४६॥