मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextआठवां अध्याय । २६३ ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यो विजानता । ब्राह्मणे साहसः पूर्वः क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ॥ २७६॥ विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रति तत्त्वतः । छेदवर्जं प्रणयनं दण्डस्येति विनिश्चयः ॥ २७७॥ एष दण्डविधिः प्रोक्तो वाक्पारुष्यस्य तत्त्वतः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दण्डपारुष्यनिर्णयम् ॥ २७८ ॥ यदि नाम और जाति को घोलकर द्वेष से द्विजातियों को गाली दे तो उस शूद्र के मुख में अग्नि में तपाई दश अंगुल की कील डाले। शूद्र, अभिमान से द्विजों को धर्मोपदेश करे तो राजा उसके मुख और कान में खौलता तेल छोड़वावे। यदि अभिमान से कहे कि तू वेद नहीं पढ़ा है, अमुक देश का नहीं है, तेरी यह जाति नहीं है, तेरे संस्कार नहीं हुए हैं तो राजा दो सौ पण दण्ड करे। काना, लूला अंधा आदि किसी को सच भी कहे तो एक कार्षापण दण्ड करे। माता, पिता, स्त्री, भाई, पुत्र, गुरु को गाली देनेवाला और गुरु को मार्ग न छोड़नेवाला सौ पण दण्ड योग्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय आपस में गाली दें तो राजा ब्राह्मण पर अढ़ाई सौ और क्षत्रिय पर पांच सौ पण दण्ड करे। वैश्य शूद्र आपस में गाली दें तो वैश्य को साधारण दण्ड और शूद्र की जीभ न काटकर कोई दूसरा दण्ड करे इस प्रकार कठोर वचन का दण्ड निर्णय कहा गया है, अब मारपीट का दण्डनिर्णय कहा जायगा ॥ २७१-२७८ ॥ येन केनचिदङ्गेन हिंस्याच्चेच्छ्रेष्ठमन्त्यजः । छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ॥ २७९ ॥ पाणिमुद्यम्य दण्डं वा पाणिच्छेदनमर्हति । पादेन प्रहरन् कोपात्पादच्छेदनमर्हति ॥ २८० ॥