मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextआठवां अध्याय । २६५ उसीके अनुसार अपराधी को दण्ड भी दुःखदायी करना चाहिये ॥ २८४-२८६ ॥ अङ्गवपीडनायां च व्रणशोणितयोस्तथा । समुत्थानव्ययं दाप्यः सर्वदण्डमथापि वा ॥ २८७ ॥ द्रव्याणि हिंस्याद्यो यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा । स तस्योत्पादयेत्तुष्टिं राज्ञो दद्याच्च तत्समम् ॥ २८८ ॥ चर्मचार्मिकभाण्डेषु काष्ठलोष्ठमयेषु च । मूल्यात्पञ्चगुणो दण्डः पुष्पमूलफलेषु च ॥ २८६ ॥ यानस्य चैव यातुश्च यानस्वामिन एव च । दशातिवर्तनान्याहुः शेषे दण्डो विधीयते ॥ २६० ॥ छिन्नास्ये भग्नयुगे तिर्यक्प्रतिमुखागते । अक्षभङ्गे च यानस्य चक्रभङ्गे तथैव च ॥ २६१ ॥ छेदने चैव यन्त्राणां योक्त्ररश्म्योस्तथैव च । आक्रन्दे चाप्यपैहीति न दण्डं मनुरब्रवीत् ॥ २६२ ॥ हाथ, पैर आदि अङ्ग तोड़ने वा घायल करनेवाले से उसके अच्छे होने के लिए खर्च दिलवावे अथवा सब प्रकार का दण्ड देय । जो जानकर वा न जानकर किसी की कोई वस्तु बिगाड़े तो उसको दाम वगैरह देकर खुश करे और राजा को उतनाही दण्ड देय । चमड़ा, चाम के पात्र-मशक आदि, काठ और मिट्टी के पात्र, फूल, मूल और फलों की हानि करने पर मूल्य से पाँच गुना दण्ड करे । सवारी सारथि और सवारी के मालिक को दश हालतों में छोड़कर बाक़ी में दण्ड दिया जाता है। नाथ टूटने, जुवा टूटने, नीचे ऊंचे के कारण, टेढ़े वा अड़कर चलने, रथ का धुरा टूटने, पहिया टूटने, रस्सी टूटने, गले की रस्सी टूटने, लगाम टूटने और 'हटो-बचो' आदि कहने पर भी यदि किसी