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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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४२ मनुस्मृति । परशाखोऽपि कर्तव्यः स्वशाखायां न नोदितः । सर्वशाखासु यत् कर्म एकं प्रत्यवशिष्यते ॥' ऐसी दशा में अन्यान्य स्मृतियों की उपेक्षा करके अपनी अपनी गृह्यस्मृति (स्मार्तसूत्र) के अनुसार यावच्छक्य गर्भा- धानादि संस्कारों का अनुष्ठान करना न्यायप्राप्त है। जैसे शुक्लयजुर्वेदीय-माध्यंदिनी शाखावालों को उनकी गृह्यस्मृति (पारस्करस्मार्तसूत्र) के अनुसार ये संस्कार करने चाहियें- (१) आर्तव (ऋतु) काल में गर्भाधान । (२) दूसरे वा तीसरे मासमें गर्भचलन के पूर्व पुंसवन । (३) छठे वा आठवें मास में सीमन्त (सीमन्तोन्नयन) । (४) उत्पन्न होने पर जातकर्म । (५) ग्यारहवें दिन नामकर्म । (६) चौथे मासमें निष्क्रमण (बालक को घर से बाहर लाना) (७) छठे मास में अन्नप्राशन । (८) पहिले वा तीसरे वा कुलाचार के अनुसार चूडा (चौल) । (गृह्यस्मृति वा याज्ञवल्क्य में अनुक्त कर्णवेध, चौल वा उपनयन के साथ यथाचार अनुष्ठेय है) (९) गर्भाधान से आठवें वा आठवें वर्ष में ब्राह्मण का, गर्भाधान से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का, बारहवें में वैश्य का, उपनयन संस्कार कहा है। यदि उक्त काल से दूना गौण काल (१६, २२, २४ वर्ष) व्यतीत हो जाय तो बाद 'व्रात्यस्तोम' नामक प्रायश्चित्त किये बिना वे सब १। इस समय पंचगौडों में तो उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त और समावर्तन ये चारों संस्कार एक ही दिन में खतम कर दिये जाते हैं । २। स्मार्त व्रात्यस्तोम कर्म दुर्लभ होरहा है ।

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