मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३०६ मनुस्मृति । पूर्वमाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात् पूर्वसाहसम् ॥ ३५४ ॥ यस्त्वनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत कारणात् । न दोषं प्राप्नुयात् किञ्चिन्न हि तस्य व्यतिक्रमः॥ ३५५॥ परस्त्रियं योभिभवेत्तीर्थेऽरण्ये वनेऽपि वा । नदीनां वापि संभेदे स संग्रहणामाप्नुयात् ॥ ३५६ ॥ उपचारक्रिया केलिः स्पर्शो भूषणवाससाम् । सहखट्टाशनं चैव सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ ३५७ ॥ स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तया । परस्परस्यानुमते सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ ३५८ ॥ परस्त्रीगमन आदि । प्रकट या परोक्ष में मारनेवाले आततायी को मारने से कोई दोष नहीं होता, क्योंकि मारनेवाले का क्रोध दूसरे के क्रोध को बढ़ाता है। परस्त्रीसंभोग में लगे मनुष्यों की नाक वगैरह काट कर देश से निकाल देवे । संसार में वर्णसङ्करता उसीसे पैदा होती है, क्योंकि अधर्म जड़ काटता है, सर्वनाश कर डालता है । व्यभिचारी पुरुष परस्त्री से एकान्त में बातचीत करता हुआ, प्रथम साहस दण्ड के योग्य होता है । पर साधारण पुरुष किसी परस्त्री से बातें करे तो वह अपराधी नहीं होता न दण्ड ही होता है । जो पुरुष तीर्थ, जङ्गल, वन और नदियों के संगमस्थान में परस्त्री से बातें करता है उसको संभोग-दूषण ही लगता है । परस्त्री को पुष्पमाला, तेल आदि भेजना, हँसी करना, उसके गहने-वस्त्र छूना, एक पलंग पर बैठना, इन सब कामों को स्त्री- संग्रहण जानना चाहिए जो आपस की सलाह से स्त्री के स्तनादि, उसका गुप्त स्थान छुवे यह सब संग्रहण कहलाता है ॥३५१-३५८॥ अब्राह्मणः संग्रहेणे प्राणान्तं दण्डमर्हति ।