मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३२६ मनुस्मृति। भार्या अपने पति से नहीं छूटती । ऐसी धर्ममर्यादा, प्रजापति की रची हम जानते हैं ॥ ४३-४६ ॥ सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ ४७ ॥ यथा गोऽश्वोष्ट्रदासीषु महिष्यजाविकासु च । नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ ४८ ॥ येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः । ते वै शस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ ४६ ॥ यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छतम् । गोमिनामेव ते वत्सा मोघं स्कन्दितमार्षभम् ॥ ५० ॥ तथैवाक्षेत्रिणो बीजं परक्षेत्रप्रवापिणः । कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजी लभते फलम् ॥ ५१ ॥ भाइयों का बँटवारा एक बार ही होता है । कन्यादान एक बार होता है और दान भी एकही बार कहने से होजाता है—सत्पु- रुष इन तीन बातों को एकवार ही करते हैं । जैसे गौ, घोड़ी, ऊंटनी, दासी, भैंस, बकरी और भेड़ आदि में सन्तान पैदा करने वाला उस सन्तान का स्वामी नहीं माना जाता, ऐसेही परस्त्री में सन्तान का भागी नहीं होता । जो क्षेत्र स्वामी न होकर, बीज बोनेवाले हों, वे उस खेत के अन्नादि फल को नहीं पासकते हैं । एक बैल दूसरे की गायों में सैकड़ों बछड़े पैदा करता है, वे गौ वालों के होते हैं और बैल का वीर्य निष्फल जाता है, वैसे ही परक्षेत्र में बोनेवाले खेतवाले का काम करते हैं, बीजवाला फल नहीं पाता ॥ ४७-५१ ॥ फलं त्वनभिसंधाय क्षेत्रिणां बीजिनां तथा ।