मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३४२ मनुस्मृति । होता है, वही पिण्डदान करे और धन ले । पुरुष पुत्र से स्वर्गलोक को जीतता है, पौत्र से अनन्त—सुख पाता है और पुत्र के पौत्र से सूर्यलोक को पाता है। पुत्र 'पुम्' नामक नरक से पिता को बचाता है इसलिए ब्रह्मा ने स्वयं पुत्र संज्ञा की है ॥ १३४-१३८ ॥ पौत्रदौहित्रयोर्लोके विशेषो नोपपद्यते । दौहित्रोऽपि ह्यमुत्रैनं संतारयति पौत्रवत् ॥ १३६ ॥ मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिका सुतः । द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तत्पितुः पितुः ॥ १४० ॥ उपपन्नो गुणैः सर्वैः पुत्रो यस्य तु दत्रिमः । स हरेतैव तदृक्थं संप्राप्तोऽप्यन्यगोत्रतः ॥ १४१ ॥ लोक में पौत्र और दौहित्र में कुछ अन्तर नहीं है । दौहित्र भी नाना को पौत्र की भांति स्वर्ग पहुँचाता है । पुत्रिका—पुत्र पहला पिण्ड माता को देवे, दूसरा—माता के पिता को, तीसरा—नाना के पिता को देवे । जिसका दत्तक (गोद लिया) पुत्र, सर्वगुणस- म्पन्न हो, वह दूसरे गोत्र से आकर भी उसकी सम्पत्ति का अधि- कारी होता है ॥ १३६-१४१ ॥ गोत्ररिक्थे जनयतुर्न हरेद्दत्रिमः क्वचित् । गोत्ररिक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा ॥ १४२ ॥ अनियुक्तासुतश्चैव पुत्रिण्याप्तश्च देवरात् । उभौ तौ नार्हतो भागं जारजातककामजौ ॥ १४३ ॥ नियुक्तायामपि पुमांन्नार्यां जातोऽविधानतः । नैवार्हः पैतृकं रिक्थं पतितोत्पादितो हि सः ॥ १४४ ॥ हरेत्तत्र नियुक्तायां जातः पुत्रो यथौरसः । क्षेत्रिकस्य तु तद्बीजं धर्मतः प्रसवश्च सः ॥ १४५ ॥