BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 490 of 649

Read in context
Page 490

३५० मनुस्मृति । अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमिति स्थितिः । इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेन्नृपः ॥ १८६ ॥ बाप, दादा और परदादा इन तीन को जल और पिण्डदान होता है। देनेवाला चौथा होता है-पाँचवें का सम्बन्ध नहीं है। जो सपिण्डों में अधिक समीप हो, उसका धन होता है । वह न हो तो कुलपुरुष वह भी न हो तो आचार्य, वह भी न हो तो शिष्य अधिकारी होता है । ये सब भी न हों तो धन ब्राह्मण पाते हैं। पर वे तीनों वेद के ज्ञाता, भीतर-बाहर से पवित्र जिते- न्द्रिय हों, जिससे श्राद्धादि कर्मों में हानि न पहुँचे । कोई भी लेने वाला न हो, तो भी ब्राह्मण का धन राजा को न लेना चाहिए- धर्ममर्यादा है। परन्तु दूसरे वर्णों का धन, कोई लेनेवाला न हो तो राजा ले सकता है ॥ १८६-१८६ ॥ संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् । तत्र तद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ॥ १६०॥ द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रिया धने । तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्स गृहीत नेतरः ॥ १६१ ॥ जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः । भजेरन् मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ॥ १६२॥ यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः । मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ॥ १६३ ॥ कोई पुत्रहीन मरजाय तो उसके सगोत्र में से पुत्र ले और उस पुरुष का जो धन हो, उसे सौंप दे। एक स्त्री में दो पुरुषों से पैदा दो पुत्र, औरस-पौनर्भव धन के लिए विवाद करें तो, जिसके पिता का जो धन हो वही उसको ले, दूसरा न लेय । माताके म- रने पर सब सहोदर भाई और कुमारी बहनें माता के धन को

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 490 of 649 · BharatKosha