मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context[Header] ३६८ मनुस्मृति ।
आरभेत ततः कार्यं संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥ २६६ ॥ राजा, मन्त्री, राज्य, देश, खजाना, दण्ड और मित्र, राज्य-शक्ति ये सात प्रकृतियों में क्रम से पहली से अगली अगली श्रेष्ठ है । इसलिए पहले अङ्ग की हानि होने से आगे के अङ्ग पर बड़ा दुःख आपड़ता है । जैसे तीन दण्ड, एक दूसरे के आधार पर रुके रहते हैं, वैसे सात अङ्गवाला राज्य भी प्रत्येक अङ्गके आधार पर टिका रहता है। प्रत्येक अङ्ग अपनी विशेषता से समान हैं। जिससे जो काम सधता है उसमें वही श्रेष्ठ कहा जाता है । राजा नित्य दूतों के द्वारा सेनाको उत्साह देवे, सब कार्यों को ठीक रक्खे अपने और शत्रुकी शक्तिको जाना करे । सब प्रकार की पीड़ा और व्यसनों का गौरव-लाघव विचार कर कार्य का आरम्भ करे ॥ २६४-२६६ ॥ आरभेतैव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः । कर्माण्यारहमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते ॥ ३०० ॥ कृतं त्रेतायुगं चैव द्वापरं कलिरेव च । राज्ञो वृत्तानि सर्वाणि राजा हि युगमुच्यते ॥ ३०१ ॥ कलिः प्रसुप्तो भवति स जाग्रद्द्वापरं युगम् । कर्मस्वभ्युद्यतस्त्रेता विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ ३०२ ॥ इन्द्रकार्यस्य वायोश्च यमस्य वरुणस्य च । चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोवृत्तं नृपश्चरेत् ॥ ३०३॥ राजा राज्यवृद्धि के कार्यों को धीरे धीरे करताही रहे । क्योंकि कर्म करनेवाले को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है । सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग, सब राजा के कार्यों पर हीं आधार रखते हैं क्योंकि राजा ही भले-बुरे समय का कारण है-युगस्वरूप है । जब राजा आलस्य, निद्रा में समय बितावे तो कलियुग, जब सावधानी से राज्य करे तो द्वापर, जब अपने कार्यों में लगा रहे तब त्रेता और जब शास्त्रानुसार कर्मों का संपादन करे तब सत्ययुग