मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context४ मनुस्मृति । से व्यभिचरित होते हैं, इसलिये प्रमाण के विषय में प्रत्यक्ष की आवश्यकता नहीं रखते हैं; ऐसा 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' = सुख चाहनेवाला अग्निहोत्रद्वारा स्वर्ग की भावना करै, इत्यादि वैदिक उपदेश-वाक्य पुरुषकृत न होने से दोषरहित, किसी काल में भी अपने अर्थ से व्यभिचरित नहीं होते । अतएव उनकी सत्यता सिद्ध करने के लिये प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है। भगवान् मनु ने यह धर्म का लक्षण कहा है- 'विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः । हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ॥' (२ । १) और धर्मशब्द से यहां छः प्रकार का धर्म लिया गया है। (१) वर्णधर्म (२) आश्रमधर्म (३) वर्णाश्रमधर्म (४) गुणधर्म = शास्त्रोक्त अभिषेक आदि गुणों से युक्त राजा का प्रजापालन (५) निमित्तधर्म = प्रायश्चित्त और (६) साधारण धर्म = धृति आदि दश (मनु० ६ अ० ६२ श्लो०) अथवा संक्षेप से अहिंसा आदि पांच (मनु० १० अ० ६३ श्लो०) और सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् में धर्म के यज्ञ, अध्ययन, दान ये तीन स्कन्ध कहे हैं। 'त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति।' धर्म के बारे में मनुस्मृति में यह कहा है- 'यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥' (२ अ० ७ श्लो०)