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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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[Header] भूमिका । ६५

[Main Text] (एतौ) ये दोनों राम-कृष्ण (पूर्वापरं) आगे पीछे (चरतः) विचरते हुए (मायया) माया से (शिशू) बाल- रूप (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते करते (अध्वरं) कंस के धनु- र्यज्ञ को (परियातः) जा पहुँचे। इनमें (अन्यः) एक कृष्ण योगेश्वर होने से (विश्वानि-भुवनानि) सारे ब्रह्माण्ड को (वि-चष्टे) जानता है। (अन्यः-पुनः) दूसरा राम (ऋतून्- दधत्) समयानुसार (जायते) अवतीर्ण हुआ। अर्थात् बलराम ने कृष्ण के समान 'तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं-' इत्यादि अद्भुतरूप से नहीं अवतार का ग्रहण किया।

नाम-रूप-लिङ्ग। परमेश्वर के नाम-रूप-लिङ्ग का दिग्द- र्शन किया जाता है जिसके जानने से साकारोपासना तथा निराकारोपासना की दृढ़ता होती है। पहले अवतारों की सिद्धि होचुकी है वे श्रीमद्भागवतानुसार ये हैं—

पहिला अवतार हिरण्यगर्भादि पदवाच्य, दूसरा वराह (रसातल में गई पृथ्वी के उद्धर्ता) तीसरा नारद (देवर्षि भाव को प्राप्त होकर सात्वततन्त्र अर्थात् पञ्चरात्रनामक वैष्ण-


[Footnotes] १ 'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्' इति ऋक्श्रुति । 'स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदि- कर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्त्तत ॥' इति स्मृतिः । 'जगृहे पौरुषं रूपं-' इत्यादि भागवत ।