मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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[Body] में विष्णु को, शिवपुराण आदि में शिव को, देवीभागवत आदि में शक्ति को, गणेशपुराण आदि में गणेश को और सूर्यपुराण आदि में सूर्य को कारण ब्रह्म मानकर उनका उत्कर्ष और अन्यों को कार्यब्रह्म मानकर उनका अपकर्ष वर्णन किया है । अन्यथा अनेक ब्रह्मवाद लोक-वेद-विरुद्ध होगा, यह बात विद्वद्वर नीलकण्ठ ने महाभारत की टीका के मुखबन्ध में कही है । पञ्चायतन पूजा का क्रम यह है— ‘शम्भौ मध्यगते हरीनहरमूर्द्धन्यो, हरौ शंकरे— भास्येनागसुता, रवौ हरगणेशाजाम्बिकाः स्थापिताः । देव्यां विष्णूहरेभवक्त्ररवयो, लम्बोदरेऽजेशरेनाम्बाः, शंकरभागतोऽति सुखदा व्यस्तास्तु हानिप्रदाः ॥’ ( निर्णय सिन्धु ) तथा, वेद,पुराण,इतिहास और तन्त्र में परमेश्वर के पञ्च देव संबन्धी जो नाम प्राप्त होते हैं उनमें से निराकार के स्पष्ट लिङ्गक नाम ( अभेदक ) लेने से अभेद और साकार के नाम (भेदक) लेने से भेद सिद्ध होता है । नाम दो प्रकार का; एक ओ३म् आदि, दूसरा विष्णु आदि । इनमें पहिला मन्त्र कह- लाता है, दूसरा नाम-मन्त्र कहलाता है । मन्त्र, केवल वैदिक- केवल तान्त्रिक और वैदिकतान्त्रिक भेद से तीन प्रकार के हैं; नाम-मन्त्र भी तीन प्रकार के हैं परन्तु उनका पूर्वोक्त भेद ही में उपसंहार है। केवल वैदिक मन्त्र- ‘सहस्रशीर्षा-’ आदि । केवल तान्त्रिकमन्त्र-‘श्रीकृष्णः शरणंमम’ आदि । उभयात्मक मन्त्र-‘ओ३म् नमो नारायणाय’ आदि । अब पहिले तान्त्रिक मन्त्रों के विषय में कुछ विचार करके बाद नाम द्वारा पञ्च देवताओं का अभेद दिखलाया जायगा ।