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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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भूमिका । ७५ ६० ज्ञान, ६१ वीरावलि, ६२ अरुणेश, ६३ मोहिनीश, ६४ विशुद्धेश्वर । ' एवमेतानि शास्त्राणि तथान्यान्यपि कोटिशः । भवतोक्तानि मे देव सर्वज्ञानमयानि च ॥' यह उपसंहार-वाक्य है । तन्त्रों में शिव-शक्ति का संवाद जो लिखा है उसका यह अभिप्राय है कि परमशिव, प्रकाश तथा विमर्शसंज्ञक दो रूप धारण करके विमर्शांश से स्वात्मा को पूछा है और प्रकाशांश से स्वात्मा को उत्तर दिया है । यह बात इन प्रमाणों से जानी जाती है— ' गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयमेव सदाशिवः । प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ॥' स्वच्छन्दतन्त्र । ' स जयति महाप्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि । कथमिव तस्मिन् दृष्टे सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे ॥ नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपस्य वर्तते शक्तिः । तद्योगादेव शिवो' जगदुत्पादयति संहरति ॥' वरिवस्यारहस्य । इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है किं तन्त्र-शास्त्र प्रमाणभूत है । और जो अपरार्क आदि कतिपय धर्मशास्त्री तन्त्र के प्रामाण्य में


१ शिव नाम की निरुक्ति यों कही है- ' हिसिधातोः सिंहशब्दो वशकान्तौ शिवः स्मृतः । वर्णव्यत्ययतः सिद्धः पश्यकः कश्यपो यथा ॥' इतना धावन ' इच्छाशक्त्याश्रय ' अर्थ के लाभार्थ ।