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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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भूमिका। ७९ से या, शिव और शक्ति शब्द से कहो। पर अर्थ में एक ही है इसी अभिप्राय से यह कहा है— 'नित्यं निर्दोषगन्धं निरतिशयसुखं ब्रह्म चैतन्यमेकं धर्मो धर्मीति भेदद्वितयमिति पृथग्भूय मायावशेन । धर्मस्तत्रानुभूतिः सकलविषयिणी सर्वकार्यानुकूला शक्तिश्चेच्छादिरूपा भवतिगुणगणश्चाश्रयस्त्वेक एव ॥ कर्तृत्वं तत्र धर्मी कलयति जगतां पञ्चसृष्ट्यादि कृत्यॆ धर्मः पुंरूपमद्वा सकलजगदुपादानभावं बिभर्ति । स्त्रीरूपं प्राप्य दिव्या भवति च महिषी स्वाश्रयस्यादिकर्तुः प्रोक्तौ धर्मप्रभेदादितिनिगमविदां धर्मिवद्ब्रह्मकोटी ॥' अप्पय दीक्षितः । अर्थात् एक सच्चिदानन्दरूप निर्विकार ब्रह्म है, वह अपनी माया-से धर्म और धर्मीभाव को प्राप्त होता है, उसकी इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति ही धर्म है और इन सब गुणों का आधार वही एक धर्मी है, धर्मी जगत् के सूक्ष्म स्थूल कार्य को करता है और धर्म उस कार्य का उपादान कारण बनता है, तथा धर्म ही स्त्रीरूप होकर अपने आश्रय आदिकर्ता धर्मी पुरुष को प्राप्त होता है, इस प्रकार वैदिकदृष्टि से दिव्य दम्पती की स्थिति है। और— 'द्विधा कृत्वत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः ॥' यहभी मानवीय श्लोक है । पीठायतन । उपास्य के पूजन के लिये नानाविध पीठा- यतन कहे हैं । जैसे—जल, अग्नि, हृदय, सूर्य, स्थण्डिल (वेदी) प्रतिमा (मृत्तिका काष्ठ पाषाण धातु की निर्मित तथा स्वयम्भू) और यन्त्र आदि ।