मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context८२ मनुस्मृति । उक्त मन्त्र का यह अर्थ है—उसकी उपमा नहीं है जिसका नाम और यश सर्वत्र फैल रहा है अर्थात् परमेश्वर निरुपम है। और परमेश्वर के रूप में यह श्रुति भी प्रमाण है— ‘ द्वे वा ब्रह्मणो रूपे मूर्त्तं चैवामूर्त्तं च ’ . मूर्त्तिशब्द का अर्थ स्त्रीपुंसाकारही नहीं है किन्तु आकार- मात्र, इसी अभिप्राय से रुद्राध्याय आदि के द्वारा परमेश्वर के पुरुषाकार सिद्ध होने पर भी उसके ‘ अष्टमूर्त्ति ’ आदि नाम प्रसिद्ध हुए । और विशेषतः स्त्रीपुंसाकार के कथन का यह आशय है कि शास्त्रकी प्रवृत्ति मनुष्यों के लिये कही है । अतएव ‘ हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात्–वे. १ । ३ । २५ ।’ इत्यादि महर्षियों के वचन प्रवृत्त हुए । और जब परमेश्वर निराकार साकार दोनों ही है, तो केवल साकार के अभि- प्राय से ही मूर्त्तिपूजन नहीं प्रवृत्त हुआ, किंतु निराकार के अभिप्राय से भी । अतएव ‘ रूपोपन्यासाच्च–वे. १।२।२३।’ इत्यादि कल्पना की गई । यदि यह कहाजाय कि साकार के प्रतिविम्व होनेसे मूर्त्तिपूजा मान भी लीजाय, पर निराकार के प्रतिविम्ब न होनेसे मूर्त्तिपूजा कैसे संगत होगी ? यह सब कुतर्क- मात्र है । देखिये, आकाश के निराकारता में भी प्रतिविम्बा- काश का व्यवहार होता है; एवं शब्द का प्रतिविम्ब-प्रति- शब्द कहलाता है; तो उक्त आकार मानने में कोई आपत्ति नहीं है । १ ‘ न तन्मुखस्य प्रतिमा चराचरे ’ श्रीहर्ष । २ ‘ या सृष्टिः स्रष्टुराद्या-’ कालिदास. । ‘ साष्टमूर्तेश्च मूर्तिः ’ भास्कराचार्य ।