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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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८४ मनुस्मृति । साढ़े तीन पुरी विष्णु की हैं। और ( १ ) काशी, ( २ ) उज्ज- यिनी, ( ३ ) माया तथा काञ्चीका अर्धभाग, यों साढ़े तीन पुरी शिव की हैं। इस प्रकार विष्णु और शिव की प्रधान सात पुरी शास्त्र लोक में प्रसिद्ध हैं। एवं विष्णु की विशाला, शिव का सेतुबन्ध है। ( १ ) कामाक्षा, ( २ ) उड्याण ( जगन्नाथ- पुरी नाम से प्रख्यात ), ( ३ ) जालंधर और ( ४ ) पुण्य- गिरि, ये चार स्थान शक्तिपीठ कहलाते हैं। भक्ति। भक्ति, ज्ञान का अवस्था विशेष है। जैसे निराका- रोपासना में ज्ञान प्रधान है, इसी प्रकार साकारोपासना में भक्ति प्रधान है। इसके छ प्रकार हैं- ( १ ) मानसी, ( २ ) वाचिकी, ( ३ ) कायिकी, ( ४ ) लौकिकी, ( ५ ) वैदिकी, ( ६ ) आध्यात्मिकी। इनके लक्षण पद्मपुराणीय अम्बरीष- नारद के संवाद में यों कहे हैं— ‘अथ भक्तिं प्रवक्ष्यामि विविधां पापनाशिनीम् । विविधा भक्तिरुद्दिष्टा मनोवाक्कायसंभवा ॥ लौकिकी वैदिकी वापि भवेदाध्यात्मिकी तथा । ध्यानधारणया बुद्ध्या देवानां स्मरणं च यत् ॥ विष्णुप्रीतिकरी चैषा मानसी भक्तिरुच्यते । मन्त्रवेदनमस्कारैरभिसंध्यं विचिन्तनैः ॥ जाप्यैश्चारण्यकैश्चैव वाचिकी भक्तिरुच्यते । व्रतोपवासनियमैस्तथेन्द्रियनिरोधनैः ॥ कायिकी सा तु निर्दिष्टा भक्तिः सर्वार्थसाधिका । भूषणैर्हेमरत्नाद्यैश्चित्राभिर्वाग्भिरेव वा ॥ १ परमेश्वर के विषय में जो इष्टसाधनता का ज्ञान यही भक्ति को उत्पन्न करता है । ज्ञान में अन्तःकरण, भक्ति में बाह्यकरण प्रधान हैं।