BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 92 of 649

Read in context
Page 92

६० मनुस्मृति। ये वचन इनकी हारीतस्मृति के हैं। तथा— ‘विना यज्ञोपवीतेन विना चक्रस्य धारणात्। विना द्वयेन वै विप्रश्चण्डालत्वमवाप्नुयात् ॥ अचक्रधारिणं विप्रं यः श्राद्धे भोजयिष्यति। रेतोमूत्रपुरीषादि स पितृभ्यः प्रयच्छति ॥ शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्रादिरहितो ब्राह्मणाधमः। स जीवन्नेव चण्डालः सर्वधर्मबहिष्कृतः॥’ ये इनकी पराशरस्मृति के उद्धार हैं। एवं श्रीविशिष्टाद्वैत-वादियों (आचार्यों) के कल्पित अन्यान्य ग्रन्थ भी हैं। जैसे—भार्गवपुराण, पद्मपुराणीय उत्तर खण्ड, भारद्वाजसंहिता, परमेश्वरसंहिता, बृहद्ब्रह्मरहस्यसंहिता, सुदर्शनमीमांसा, चक्रोल्लास, प्रपन्नामृत, नारायणसारसंग्रह इत्यादि। यह अनूठा निन्दा प्रकार देखकर आश्चर्य होता है और इन्हों के लिखे हुए रागद्वेषकलुषितवाक्यों से ब्राह्मणों की चण्डालता, इनसे अन्य वैष्णवों की अवैष्णवता, तथा शिर्वा- दिकों की अपूज्यत्ता आदि कैसे सिद्ध होसकती है, कथमपि १ द्वयसंज्ञक मन्त्र ये हैं— ‘श्रीमन्नारायणचरणौ शरणं प्रपद्ये’ ‘श्रीमते नारायणाय नमः’ इनकी प्रशंसा कई स्थान में है। (वैष्णव प्रदीप) २ विज्ञजन ‘आदि’ शब्द का अर्थ ढूँढ़ें! ३ आप लोगों की भारद्वाजसंहिता का वचन है कि- ‘नातिसङ्गं परिचरेत् पित्रादीनप्यवैष्णवान्। ब्रह्मरुद्रदिगीशार्कशक्तिक्षेत्रभवादयः ॥ नित्यमभ्यर्चने वर्ज्याः कामोऽपि स्यान्न तन्मुखः ॥’