मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 212 of 1098
Read in contextPage 212
२०२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुर्नृपः।<br>मैत्रायणावरः सोऽथ मैत्रेयस्तु ततः स्मृतः॥ १३<br>एते वंश्य यतेः पक्षाः क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः।<br>राजा चैद्यवरो नाम मैत्रेयस्य सुतः स्मृतः॥ १४<br>अथ चैद्यवराद् विद्वान् सुदासस्तस्य चात्मजः।<br>अजमीढः पुनर्जातः क्षीणे वंशे तु सोमकः॥ १५<br>सोमकस्य सुतो जन्तुर्हते तस्मिञ्शतं बभौ।<br>पुत्राणामजमीढस्य सोमकस्य महात्मनः॥ १६<br>महिषी त्वजमीढस्य धूमिनी पुत्रवर्धिनी।<br>पुत्राभावे तपस्तेपे शतं वर्षाणि दुश्चरम्॥ १७<br>हुत्वाग्निं विधिवत् सम्यक् पवित्रीकृतभोजना।<br>अग्निहोत्रक्रमेणैव सा सुष्वाप महाव्रता॥ १८<br>तस्यां वै धूम्रवर्णायामजमीढः समीयिवान्।<br>ऋक्षं सा जनयामास धूमवर्णं शताग्रजम्॥ १९<br>ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् ततः।<br>यः प्रयागमतिक्रम्य कुरुक्षेत्रमकल्पयत्॥ २०<br>कृषतस्तु महाराजो वर्षाणि सुबहून्यथ।<br>कृष्यमाणस्ततः शक्रो भयात् तस्मै वरं ददौ॥ २१<br>पुण्यं च रमणीयं च कुरुक्षेत्रं तु तत् स्मृतम्।<br>तस्यान्ववायः सुमहान् यस्य नाम्ना तु कौरवाः॥ २२ | दिवोदासका ज्येष्ठ पुत्र धर्मिष्ठ राजा मित्रयु हुआ। तत्पश्चात् उससे छोटे मैत्रायण और उसके बाद मैत्रेयकी उत्पत्ति हुई। ये सभी पुत्र (ययातिके भाई) यतिके पक्षके थे और क्षत्रियांशसे युक्त भार्गव (भृगुवंशी) कहलाते थे। राजा चैद्यवर मैत्रेयके पुत्र कहे जाते हैं। चैद्यवरसे विद्वान् सुदासका जन्म हुआ। वंशके नष्ट हो जानेपर पुनः अजमीढ सुदासके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुए। इन्हींका दूसरा नाम सोमक भी है। सोमकका पुत्र जन्तु हुआ। उसके मारे जानेपर महात्मा अजमीढ सोमकके सौ पुत्र हुए। अजमीढकी धूमिनी नामकी पत्नी थी, जो पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाली थी। जन्तुके मारे जानेसे पुत्रका अभाव हो जानेपर वह सौ वर्षोंतक दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गयी। एक समय भलीभाँति पवित्र किये हुए पदार्थोंको ही भोजन करनेवाली महान् व्रतपरायणा धूमिनी अग्निहोत्रके क्रमसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके नींदके वशीभूत हो गयी। निरन्तर अग्निहोत्र करनेके कारण उसके शरीरका रंग धूमिल पड़ गया था। उसी समय अजमीढने उसमें गर्भाधान किया। उस गर्भसे धूमिनीने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था तथा जिसके शरीरका रंग धूम-वर्णका था। ऋक्षसे संवरणकी और संवरणसे कुरुकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने प्रयागका अतिक्रमण कर कुरुक्षेत्रकी तीर्थरूपमें कल्पना की थी। महाराज कुरु अनेकों वर्षोंतक इस कुरुक्षेत्रको अपने हाथों जोतते रहे। उन्हें इस प्रकार जोतते देखकर इन्द्रने भयभीत हो उन्हें वर प्रदान किया। इसी कारण कुरुक्षेत्र पुण्यप्रद और रमणीय क्षेत्र कहा जाता है। उन महाराज कुरुका वंश अत्यन्त विशाल था, जो उन्हींके नामसे (आगे चलकर) कौरव कहलाया॥ १३—२२॥ |
| कुरोस्तु दयिताः पुत्राः सुधन्वा जहुरेव च।<br>परीक्षिच्च महातेजाः प्रजनश्चारिमर्दनः॥ २३<br>सुधन्वनस्तु दायादः पुत्रो मतिमतां वरः।<br>च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित्॥ २४<br>च्यवनस्य कृमिः पुत्र ऋक्षाज्जज्ञे महातपाः।<br>कृमेः पुत्रो महावीर्यः ख्यातस्त्विन्द्रसमो विभुः॥ २५<br>चैद्योपरिचरो वीरो वसुर्नामान्तरिक्षगः।<br>चैद्योपरिचराज्जज्ञे गिरिका सप्त वै सुतान्॥ २६ | कुरुके सुधन्वा, जह्नु, महातेजस्वी परीक्षित् और शत्रुविनाशक प्रजन—ये चार परम प्रिय पुत्र हुए। सुधन्वाका पुत्र राजा च्यवन हुआ, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ एवं धर्म और अर्थके तत्त्वका ज्ञाता था। च्यवनका पुत्र कृमि हुआ, जो ऋक्षसे उत्पन्न हुआ था। (इन्हीं) कृमिके पुत्र महापराक्रमी चैद्योपरिचर वसु हुए। वे प्रभावशाली, शूरवीर, इन्द्रके समान विख्यात और (सदा विमानद्वारा) आकाशमें गमन करनेवाले थे। चैद्योपरिचरके संयोगसे गिरिकाने सात |