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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 215 of 1098

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Page 215

* अध्याय ५० *
२०५

| सुभद्रायां रथी पार्थादभिमन्युरजायत।<br>यौधेयं देवकी चैव पुत्रं जज्ञे युधिष्ठिरात्॥ ५६<br>अभिमन्योः परीक्षित् तु पुत्रः परपुरञ्जयः।<br>जनमेजयः परीक्षितः पुत्रः परमधार्मिकः॥ ५७ | पृथा-पुत्र अर्जुनके संयोगसे सुभद्राके गर्भसे महारथी अभिमन्यु पैदा हुआ था। युधिष्ठिर-पत्नी देवकीने युधिष्ठिरके संयोगसे यौधेय नामक पुत्रको जन्म दिया था। अभिमन्युके पुत्र शत्रुओंकी नगरीको जीतनेवाले परीक्षित् हुए। परीक्षित्के पुत्र परम धर्मात्मा जनमेजय (तृतीय) हुए॥ ५१—५७॥ | | ब्रह्माणं कल्पयामास स वै वाजसनेयकम्।<br>स वैशम्पायनेनैव शप्तः किल महर्षिणा॥ ५८<br>न स्थास्यतीह दुर्बुद्धे तवैतद् वचनं भुवि।<br>यावत् स्थास्यसि त्वं लोके तावदेव प्रपत्स्यति॥ ५९<br>क्षत्रस्य विजयं ज्ञात्वा ततः प्रभृति सर्वशः।<br>अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपं च जनमेजयम्॥ ६०<br>ततः प्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः।<br>उत्सन्ना याजिनो यज्ञे ततः प्रभृति सर्वशः॥ ६१<br>क्षत्रस्य याजिनः केचिच्छापात् तस्य महात्मनः।<br>पौर्णमासेन हविषा इष्ट्वा तस्मिन् प्रजापतिम्।<br>स वैशम्पायनेनैव प्रविशन् वारितस्ततः॥ ६२<br>परीक्षितः सुतोऽसौ वै पौरवो जनमेजयः।<br>द्विरश्वमेधमाहृत्य महावाजसनेयकः॥ ६३<br>प्रवर्तयित्वा तं सर्वमृषिं वाजसनेयकम्।<br>विवादे ब्राह्मणैः सार्धमभिशप्तो वनं ययौ॥ ६४<br>जनमेजयाच्छतानीकस्तस्माज्जज्ञे स वीर्यवान्।<br>जनमेजयः शतानीकं पुत्रं राज्येऽभिषिक्तवान्॥ ६५<br>अथाश्वमेधेन ततः शतानीकस्य वीर्यवान्।<br>जज्ञेऽधिसीमकृष्णाख्यः साम्प्रतं यो महायशाः॥ ६६<br>तस्मिञ्शासति राष्ट्रं तु युष्माभिरिदमाहृतम्।<br>दुरापं दीर्घसत्रं वै त्रीणि वर्षाणि पुष्करे।<br>वर्षद्वयं कुरुक्षेत्रे दृषद्वत्यां द्विजोत्तमाः॥ ६७ | जनमेजयने अपने यज्ञमें वाजसनेय (शुक्लयजुर्वेदके आचार्य) ऋषिको ब्रह्माके पदपर नियुक्त किया। यह देखकर वैशम्पायन (कृष्णयजुर्वेदके आचार्य)-ने उन्हें शाप देते हुए कहा—‘दुर्बुद्धे! तुम्हारा यह (नवीन) वचन अर्थात् (संहिता-ग्रन्थ) भूतलपर स्थायी नहीं हो सकेगा। जबतक तुम लोकमें जीवित रहोगे, तभीतक यह भी ठहर सकेगा।' तभीसे क्षत्रियजातिकी विजय जानकर बहुत-से लोग चारों ओरसे (शुक्लयजुर्वेदके प्रवर्धक) राजा जनमेजयके पास आकर रहने लगे। परंतु महात्मा वैशम्पायनके शापके कारण उस यज्ञमें बहुत-से यज्ञानुष्ठान करनेवाले क्षत्रिय तथा कुछ याजक भी नष्ट हो गये। तब उस यज्ञमें जब जनमेजय पौर्णमास हविद्वारा ब्रह्माका यजन कर यज्ञशालामें प्रवेश करनेके लिये प्रयत्नशील हुए, उसी समय महर्षि वैशम्पायनने उन्हें भीतर जानेसे रोक दिया। तदनन्तर परीक्षित्पुत्र पूरुवंशी जनमेजयने दो अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उनमें उन्होंने अपने द्वारा प्रवर्तित महावाजसनेय (शौक्लयजुष) विधिको ही प्रयोग किया। वह सारा कार्य वाजसनेय ऋषिकी अध्यक्षतामें ही सम्पन्न हो रहा था। उसी समय ब्राह्मणोंके साथ विवाद हो जानेपर ब्राह्मणोंने उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे वनमें चले गये।* उन जनमेजयसे पराक्रमी शतानीकका जन्म हुआ। जनमेजयने (वन-गमन करते समय) अपने पुत्र शतानीकको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया था। शतानीकद्वारा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किये जानेपर उसके फलस्वरूप शतानीकके एक महायशस्वी एवं पराक्रमी अधिसीमकृष्ण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इस (पुराणप्रवचनके) समय सिंहासनासीन है। द्विजवरो! उसीके राज्यशासन करते समय आपलोगोंने अभी-अभी पुष्करक्षेत्रमें तीन वर्षोंतक तथा कुरुक्षेत्रमें दृषद्वतीके तटपर दो वर्षोंतक इस दुर्लभ दीर्घ सत्रका अनुष्ठान सम्पन्न किया है॥ ५८—६७॥ | | ऋषय ऊचुः<br>भविष्यं श्रोतुमिच्छामः प्रजानां लोमहर्षणे।<br>पुरा किल यदेतद् वै व्यतीतं कीर्तितं त्वया॥ ६८ | **ऋषियोंने पूछा—**लोमहर्षणके पुत्र सूतजी! पूर्वकालमें जो बातें बीत चुकी हैं, उनका वर्णन तो आपने कर दिया। अब हमलोग प्रजाओंके भविष्यके विषयमें सुनना चाहते हैं। |


* द्रष्टव्य-हरिवंशपु०, भविष्यपु०, अ० ५ ।