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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 219 of 1098

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Page 219
* अध्याय ५१ *२०९

| पर्जन्यः पवमानस्तु द्वितीयः सोऽनुदृश्यते।<br>पावकोष्णाः समूह्यास्तु वोत्तरे सोऽग्निरुच्यते॥ २०<br>हव्यसूदो ह्यसम्मूज्यः शामित्रः स विभाव्यते।<br>शतधामा सुधाज्योती रौद्रैश्वर्यः स उच्यते॥ २१<br>ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा ब्रह्मस्थानीय उच्यते।<br>अजैकपादुपस्थेयः स वै शालामुखो यतः॥ २२<br>अनिर्देश्यो ह्यहिर्बुध्न्यो बहिरन्ते तु दक्षिणे।<br>पुत्रा ह्येते वासवस्य उपस्थेया द्विजैः स्मृताः॥ २३ | पवमान नामक जो द्वितीय अग्नि हैं, वे पर्जन्यके रूपमें देखे जाते हैं और उत्तर दिशामें स्थित पावक नामक अग्निको समूह्या अग्नि कहा जाता है। असम्मृज्य हव्यसूद अग्निको शामित्र कहा जाता है। शतधामा अग्नि सुधाज्योति हैं, इन्हें रौद्रैश्वर्य नामसे अभिहित किया जाता है। ब्रह्मज्योति अग्निको वसुधाम और ब्रह्मस्थानीय भी कहते हैं। अजैकपाद् उपासनीय अग्नि हैं, इन्हें शालामुख भी कहा जाता है। अहिर्बुध्न्य अनिर्देश्य अग्नि हैं, ये वेदीकी दक्षिण दिशामें परिधिके अन्तमें स्थित होते हैं। वासव नामक अग्निके ये आठों पुत्र ब्राह्मणोंद्वारा उपासनीय बतलाये गये हैं॥ ११-२३॥ | | ततो विहरणीयांस्तु वक्ष्याम्यष्टौ तु तान् सुतान्।<br>होत्रियस्य सुतो ह्यग्निर्बर्हिषो हव्यवाहनः॥ २४<br>प्रशंस्योऽग्निः प्रचेतास्तु द्वितीयः संसहायकः।<br>सुतो ह्यग्नेर्विश्ववेदा ब्राह्मणाच्छंसिरुच्यते॥ २५<br>अपां योनिः स्मृतः स्वाम्भः सेतुर्नाम विभाव्यते।<br>धिष्ण्य आहरणा ह्येते सोमेनेज्यन्त वै द्विजैः॥ २६<br>ततो यः पावको नाम्ना यः सद्भिर्योग उच्यते।<br>अग्निः सोऽवभृथो ज्ञेयो वरुणेन सहेज्यते॥ २७ | अब मैं उन आठ विहरणीय अग्निपुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। बर्हिष् नामक होत्रिय अग्निके पुत्र हव्यवाहन अग्नि हैं। इसके पश्चात् प्रचेता नामक प्रशंसनीय अग्निकी उत्पत्ति हुई, जिनका दूसरा नाम संसहायक है। पुनः अग्निपुत्र विश्ववेदा हुए, जिन्हें ब्राह्मणाच्छंसी¹ भी कहा जाता है। जलसे उत्पन्न होनेवाले प्रसिद्ध स्वाम्भ अग्नि सेतु नामसे भी अभिहित होते हैं। इन धिष्ण्यसंज्ञक अग्नियोंका यज्ञमें यथास्थान आवाहन होता है और ब्राह्मणलोग सोम-रसद्वारा इनकी पूजा करते हैं। तत्पश्चात् जो पावक नामक अग्नि हैं, जिन्हें सत्पुरुषगण योग नामसे पुकारते हैं, उन्हींको अवभृथ अग्नि² समझना चाहिये। उनकी वरुणके साथ पूजा होती है। | | हृदयस्य सुतो ह्यग्नेर्जठरेऽसौ नृणां पचन्।<br>मन्युमाञ्जठरश्चाग्निर्विद्वाग्निः सततं स्मृतः॥ २८<br>परस्परोत्थितो ह्यग्निर्भूतानीह विभुर्दहन्।<br>अग्नेर्मन्युमतः पुत्रो घोरः संवर्तकः स्मृतः॥ २९<br>पिबन्नपः स वसति समुद्रे वडवामुखे।<br>समुद्रवासिनः पुत्रः सहरक्षो विभाव्यते॥ ३०<br>सहरक्षस्तु वै कामान् गृहे स वसते नृणाम्।<br>क्रव्यादग्निः सुतस्तस्य पुरुषान् योऽत्ति वै मृतान्॥ ३१<br>इत्येते पावकस्याग्नेर्द्विजैः पुत्राः प्रकीर्तिताः।<br>ततः सुतास्तु सौवीर्याद् गन्धर्वैरसुरैर्हताः॥ ३२<br>मथितो यस्त्वरण्यां तु सोऽग्निराप समिन्धनम्।<br>आयुर्नाम्ना तु भगवान् पश्चौ यस्तु प्रणीयते॥ ३३<br>आयुषो महिमान् पुत्रो दहनस्तु ततः सुतः।<br>पाकयज्ञेष्वभीमानी हुतं हव्यं भुनक्ति यः॥ ३४ | हृदय नामक अग्निके पुत्र मन्युमान् हैं, जिन्हें जठराग्नि भी कहते हैं। ये मनुष्योंके उदरमें स्थित रहकर भक्षित पदार्थोंको पचाते हैं। परस्परके संघर्षसे उत्पन्न हुए प्रभावशाली अग्निको, जो जगत्में निरन्तर प्राणियोंको जलाते रहते हैं, विद्वाग्नि कहते हैं। मन्युमान् अग्निके पुत्र संवर्तक हैं जो अत्यन्त भयंकर बताये जाते हैं। वे समुद्रमें बडवामुखद्वारा निरन्तर जलपान करते हुए निवास करते हैं। समुद्रवासी संवर्तक अग्निके पुत्र सहरक्ष बतलाये जाते हैं। सहरक्ष मनुष्योंके घरोंमें निवास करते हैं और उनकी सभी कामनाओंको सम्पन्न करते रहते हैं। सहरक्षके पुत्र क्रव्यादग्नि हैं, जो मरे हुए पुरुषोंका भक्षण करते हैं। इस प्रकार ये सभी ब्राह्मणोंद्वारा पावक नामक अग्निके पुत्र बतलाये गये हैं। इनके अतिरिक्त जो अन्य पुत्र हैं, उन्हें सौवीर्यसे गन्धर्वों और असुरोंने हरण कर लिया था। अरणीमें मन्थन करनेसे जो अग्नि उत्पन्न होता है, वह तो इन्धनके आश्रित रहता है। पृथु-योनिके लिये जिन अग्निकी नियुक्ति हुई है, उन ऐश्वर्यशाली अग्निका नाम आयु है। आयुके पुत्र महिमान् और उनके पुत्र दहन हैं, जो पाकयज्ञोंके अभिमानी देवता हैं। वे ही उन यज्ञोंमें हवन किये गये हविको खाते हैं। |


१. यह अग्निष्टोमके १६ ऋत्विजोंमेंसे भी एक होता है, जिसका इस अग्निपरिचर्यासे विशेष सम्बन्ध होता है।
२. यज्ञान्तहवन एवं अवभृथ स्नानके समय इसका उपयोग होता है।