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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 221 of 1098

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Page 221
* अध्याय ५२ *२११

बावनवाँ अध्याय

कर्मयोगकी महत्ता

संस्कृत (मूल श्लोक)हिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>इदानीं प्राह यद् विष्णुः पृष्टः परममुत्तमम्।<br>तमिदानीं समाचक्ष्व धर्माधर्मस्य विस्तरम्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! सूर्यपुत्र मनुद्वारा पूछे जानेपर भगवान् विष्णुने उनसे धर्म और अधर्मके जिस परम उत्तम प्रसङ्गको विस्तारपूर्वक कहा था, वह इस समय आप हमलोगोंको बतलाइये॥ १॥
सूत उवाच<br>एवमेकार्णवे तस्मिन् मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>विस्तारमादिसर्गस्य प्रतिसर्गस्य चाखिलम्॥ २<br>कथयामास विश्वात्मा मनवे सूर्यसूनवे।<br>कर्मयोगं च सांख्यं च यथावद् विस्तारान्वितम्॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! प्रलयकालके उस एकार्णवके जलमें मत्स्यरूपधारी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने सूर्यपुत्र मनुके प्रति सर्गके विस्तारका पूर्णरूपसे वर्णन किया था। साथ ही कर्मयोग और सांख्ययोगको भी उन्हें विस्तारपूर्वक यथार्थरूपसे बतलाया था (उसे ही मैं आपलोगोंको सुनाना चाहता हूँ)॥ २-३॥
ऋषय ऊचुः<br>श्रोतुमिच्छामहे सूत कर्मयोगस्य लक्षणम्।<br>यस्मादविदितं लोके न किंचित् तव सुव्रत॥ ४**ऋषियोंने पूछा—**उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सूतजी! आपके लिये लोकमें कोई वस्तु अज्ञात तो है नहीं, अतः हमलोग आपसे कर्मयोगका लक्षण सुनना चाहते हैं॥ ४॥
सूत उवाच<br>कर्मयोगं च वक्ष्यामि यथा विष्णुविभाषितम्।<br>ज्ञानयोगसहस्राद्धि कर्मयोगः प्रशस्यते॥ ५<br>कर्मयोगोद्भवं ज्ञानं तस्मात् तत्परमं पदम्।<br>कर्मज्ञानोद्भवं ब्रह्म न च ज्ञानमकर्मणः॥ ६<br>तस्मात् कर्मणि युक्तात्मा तत्त्वमाप्नोति शाश्वतम्।<br>वेदोऽखिलो धर्ममूलमाचारश्चैव तद्विदाम्॥ ७<br>अष्टावात्मगुणास्तस्मिन् प्रधानत्वेन संस्थिताः।<br>दया सर्वेषु भूतेषु क्षान्ती रक्षाऽऽतुरस्य तु॥ ८<br>अनसूया तथा लोके शौचमन्तर्बहिर्द्विजाः।<br>अनायासेषु कार्येषु माङ्गल्याचारसेवनम्॥ ९<br>न च द्रव्येषु कार्पण्यमार्तेषूपार्जितेषु च।<br>तथास्पृहा परद्रव्ये परस्त्रीषु च सर्वदा॥ १०**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! विष्णुभगवान्‌ने जिस प्रकार कर्मयोगकी व्याख्या की थी, उसे मैं बतला रहा हूँ। कर्मयोग ज्ञानयोगसे हजारोंगुना अधिक प्रशस्त है; क्योंकि ज्ञान कर्मयोगसे ही प्रादुर्भूत होता है; अतः वह परमपद है। ब्रह्म भी कर्मज्ञानसे उद्भूत होता है। कर्मके बिना तो ज्ञानकी सत्ता ही नहीं है। इसीलिये कर्मयोगके अभ्यासमें संलग्न मनुष्य अविनाशी तत्त्वको प्राप्त कर लेता है। सम्पूर्ण वेद और वेदज्ञोंके आचार-विचार धर्मके मूल हैं। उनमें आठ प्रकारके आत्मगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहते हैं; जैसे समस्त प्राणियोंपर दया, क्षमा, दुःखसे पीडित प्राणीको आश्वासन प्रदान करना और उसकी रक्षा करना, जगत्में किसीसे ईर्ष्या-द्वेष न करना, बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता, परिश्रमरहित अथवा अनायास प्राप्त हुए कार्योंके अवसरपर उन्हें माङ्गलिक आचार-व्यवहारके द्वारा सम्पन्न करना, अपने द्वारा उपार्जित द्रव्योंसे दीन-दुखियोंकी सहायता करते समय कृपणता न करना तथा पराये धन और परायी स्त्रीके प्रति सदा निःस्पृह