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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 443 of 1098

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Page 443
* अध्याय १२४ *४३३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ते वक्ष्यामि प्रसंख्याय योजनैस्तु निबोधत।<br>एकैकमन्तरं तस्या नियुतान्येकसप्ततिः॥ ६३<br>सहस्राण्यतिरिक्ता च ततोऽन्या पञ्चविंशतिः।<br>लेखयोः काष्ठयोश्चैव बाह्याभ्यन्तरयोश्चरन्॥ ६४<br>अभ्यन्तरं स पर्यति मण्डलान्युत्तरायणे।<br>बाह्यतो दक्षिणेनैव सततं सूर्यमण्डलम्॥ ६५<br>चरन्नसावुदीच्यां च ह्यशीत्या मण्डलाच्छतम्।<br>अभ्यन्तरं स पर्यति क्रमते मण्डलानि तु॥ ६६अन्तर योजनोंमें परिगणित करके बतला रहा हूँ, सुनिये। उनमें एकसे दूसरीका अन्तर एकहत्तर लाख पचीस हजार योजन है। सूर्य दोनों दिशाओं और रेखाओंके बाहरी और भीतरी भागमें चक्कर लगाते हैं। यह सूर्यमण्डल सदा उत्तरायणमें मण्डलोंके भीतर और दक्षिणायनमें बाहरसे चक्कर लगाता है। उत्तर दिशामें विचरते हुए सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलोंके भीतरसे गुजरते हुए उन्हें पार करते हैं॥ ६३-६६॥
प्रमाणं मण्डलस्यापि योजनानां निबोधत।<br>योजनानां सहस्राणि दश चाष्टौ तथा स्मृतम्॥ ६७<br>अधिकान्यष्टपञ्चाशद्योजनानि तु वै पुनः।<br>विष्कम्भो मण्डलस्यैव तिर्यक् स तु विधीयते॥ ६८<br>अहस्तु चरते नाभेः सूर्यो वै मण्डलं क्रमात्।<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा चन्द्रो रविस्तथा॥ ६९<br>दक्षिणे चक्रवत्सूर्यस्तथा शीघ्रं निवर्तते।<br>तस्मात् प्रकृष्टां भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति॥ ७०<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणां मध्ये चरति मण्डलम्॥ ७१<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्।<br>कुलालचक्रमध्यस्थो यथा मन्दं प्रसर्पति॥ ७२<br>उदग्याने तथा सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः।<br>तस्माद् दीर्घेण कालेन भूमिं सोऽल्पां प्रसर्पति॥ ७३<br>सूर्योऽष्टादशभिरहो मुहूर्तैरुदगायने।<br>त्रयोदशानां मध्ये तु ऋक्षाणां चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तानि ऋक्षाणि रात्रौ द्वादशभिश्चरन्॥ ७४<br>ततो मन्दतरं ताभ्यां चक्रं तु भ्रमते पुनः।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो भ्रमतेऽसौ ध्रुवस्तथा॥ ७५<br>मुहूर्तैस्त्रिंशता तावदहोरात्रं ध्रुवो भ्रमन्।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमते मण्डलानि तु॥ ७६अब मण्डलका प्रमाण योजनोंकी गणनामें सुनिये। इसका परिमाण अठारह हजार अट्ठावन योजन बतलाया जाता है। इस मण्डलका व्यास तिरछा जानना चाहिये। सूर्य दिनभर कुम्हारके चाककी तरह नाभिमण्डलपर चक्कर लगाते हैं। सूर्यकी भाँति चन्द्रमा भी वैसा ही भ्रमण करते हैं। उसी प्रकार दक्षिणायनमें भी सूर्य चाककी तरह शीघ्रतापूर्वक चलते हुए उसे पार करते हैं। इसी कारण वे इतनी विस्तृत भूमिको थोड़े ही समयमें पार कर जाते हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य साढ़े तेरह नक्षत्रोंके मण्डलको शीघ्रतापूर्वक मध्यभागसे गुजरते हुए बारह मुहूर्तोंमें पार करते हैं, किंतु रातके समय उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें अठारह मुहूर्त लगता है। जैसे कुम्हारके चाकके मध्यभागमें स्थित वस्तुकी गति मन्द हो जाती है, वैसे ही उत्तरायणके समय सूर्य मन्दगतिसे चलते हैं। इसी कारण थोड़ी-सी भूमि पार करनेमें उन्हें अधिक समय लगाना पड़ता है। उत्तरायणके समय सूर्य दिनके अठारह मुहूर्तोंमें तेरह नक्षत्रोंके मध्यमें विचरते हैं, किंतु रातमें उन्हीं नक्षत्रोंको पार करनेमें उन्हें बारह मुहूर्त लगते हैं। वह चक्र उन दोनों गतियोंसे मन्दतर गतिमें घूमता है। चाकके मध्यभागमें रखे हुए मृत्पिण्डकी तरह ध्रुव भी उस चक्रके मध्यमें स्थित होकर घूमते रहते हैं। ध्रुव तीस मुहूर्त अर्थात् दिन-रातभरमें दोनों दिशाओंके मध्यवर्ती मण्डलोंमें भ्रमण करते हैं॥ ६७-७६॥
उत्तरक्रमणेऽर्कस्य दिवा मन्दगतिः स्मृता।<br>तस्यैव तु पुनर्नक्तं शीघ्रा सूर्यस्य वै गतिः॥ ७७<br>दक्षिणप्रक्रमे वापि दिवा शीघ्रं विधीयते।<br>गतिः सूर्यस्य वै नक्तं मन्दा चापि विधीयते॥ ७८उत्तरायणके समय दिनमें सूर्यकी गति मन्द और रात्रिके समय उन्हीं सूर्यकी गति तेज बतलायी गयी है। उसी तरह दक्षिणायन-कालमें सूर्यकी गति दिनमें तेज और रात्रिमें मन्द कही गयी है।