मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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| * अध्याय १३४ * | ४७३ |
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| मकरतिमितिमिङ्गिलावृतः<br> प्रलय इवातिसमुद्धतोऽर्णवः।<br>व्रजति रथवरोऽतिभास्वरो<br> ह्यशनिनिपातपयोदनिःस्वनः ॥ ७१ | वह अत्यन्त उद्दीप्त श्रेष्ठ रथ प्रलयकालमें मकर, तिमि (एक प्रकारके महामत्स्य) और तिमिंगिलों (उसे निगलनेवाले महामत्स्य)—से व्याप्त भयंकर रूपसे उमड़े हुए समुद्रकी तरह आगे बढ़ रहा था। उससे वज्रपातकी तरह गड़गड़ाहट और बादलकी गर्जनाके सदृश शब्द हो रहा था॥ ५८—७१ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे रथप्रयाणं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें रथप्रयाण नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३३ ॥
एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय
देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी
| सूत उवाच | |
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| पूज्यमाने रथे तस्मिंल्लोकैर्देवे रथे स्थिते।<br>प्रमथेषु नदत्सूग्रं प्रवदत्सु च साध्विति ॥ १<br>ईश्वरस्वरघोषेण नर्दमाने महावृषे।<br>जयत्सु विप्रेषु तथा गर्जत्सु तुरगेषु च ॥ २<br>रणाङ्गणात् समुत्पत्य देवर्षिर्नारदः प्रभुः।<br>कान्त्या चन्द्रोपमस्तूर्णं त्रिपुरं पुरमागतः ॥ ३<br>औत्पातिकं तु दैत्यानां त्रिपुरे वर्तते ध्रुवम्।<br>नारदश्चात्र भगवान् प्रादुर्भूतस्तपोधनः ॥ ४<br>आगतं जलदाभासं समेताः सर्वदानवाः।<br>उत्तस्थुर्नारदं दृष्ट्वा अभिवादनवादिनः ॥ ५<br>तमर्घ्येण च पाद्येन मधुपर्केण चेश्वराः।<br>नारदं पूजयामासुर्ब्रह्माणमिव वासवः ॥ ६<br>तेषां स पूजां पूजार्हः प्रतिगृह्य तपोधनः।<br>नारदः सुखमासीनः काञ्चने परमासने ॥ ७<br>मयस्तु सुखमासीने नारदे नारदोद्भवे।<br>यथार्हं दानवैः सार्धमासीनो दानवाधिपः ॥ ८<br>आसीनं नारदं प्रेक्ष्य मयस्त्वथ महासुरः।<br>अब्रवीद् वचनं तुष्टो हृष्टरोमाननेक्षणः ॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार उस लोकपूजित रथपर आरूढ़ होकर जब महादेवजी त्रिपुरपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थित हुए, उस समय प्रमथगण 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए उच्च स्वरसे सिंहनाद करने लगे। महान् वृषभ नन्दी भी शङ्करजीके सदृश स्वरमें गर्जना करने लगा। यूथ-के-यूथ विप्र जय-जयकार बोलने लगे तथा घोड़े हींसने लगे। इसी समय चन्द्रतुल्य कान्तिवाले सामर्थ्यशाली देवर्षि नारद युद्धस्थलसे उछलकर तुरंत त्रिपुर नामक नगरमें जा पहुँचे। दैत्योंके उस त्रिपुरमें निश्चितरूपसे उत्पात हो रहे थे। वहाँ तपस्वी भगवान् नारद सहसा प्रकट हो गये। श्वेत मेघकी-सी प्रभाववाले नारदजीको आया हुआ देखकर सभी दानव एक साथ अभिवादन करते हुए उठ खड़े हुए। तत्पश्चात् उन ऐश्वर्यशाली दानवोंने पाद्य, अर्घ्य और मधुपर्कद्वारा नारदजीकी उसी प्रकार पूजा की, जैसे इन्द्र ब्रह्माकी अर्चना करते हैं। तब पूजनीय तपस्वी नारदजी उनकी पूजा स्वीकार कर स्वर्णनिर्मित श्रेष्ठ आसनपर सुखपूर्वक विराजमान हुए। इस प्रकार ब्रह्मपुत्र नारदके सुखपूर्वक बैठ जानेपर दानवराज मय भी सभी दानवोंके साथ यथायोग्य आसनपर बैठ गया। इस तरह नारदजीको वहाँ सुखपूर्वक बैठे देखकर महासुर मयको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह हर्षसे रोमाञ्चित हो उठा, उसके मुख एवं नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे, उसने नारदजीसे ये बातें कहीं॥ १—९॥ |