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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 507 of 1098

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Page 507
* अध्याय १३९ *४९७

एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय

दानवराज मयका दानवोंको समझा-बुझाकर त्रिपुरकी रक्षामें नियुक्त करना तथा त्रिपुरकौमुदीका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
तारकाख्ये हते युद्धे उत्सार्य प्रमथान् मयः।<br>उवाच दानवान् भूयो भूयः स तु भयावृतान्॥ १<br>भोऽसुरेन्द्राधुना सर्वे निबोधध्वं प्रभाषितम्।<br>यत् कर्तव्यं मया चैव युष्माभिश्च महाबलैः॥ २<br>पुष्यं समेष्यते काले चन्द्रश्चन्द्रनिभाननाः।<br>यदैकं त्रिपुरं सर्वं क्षणमेकं भविष्यति॥ ३<br>कुरुध्वं निर्भयाः काले पिशुनांशंसितेन च।<br>स कालः पुष्ययोगस्य पुरस्य च मया कृतः॥ ४<br>काले तस्मिन् पुरे यस्तु सम्भावयति संहतिम्।<br>स एनं कारयेच्चूर्णं बलिनैकेषुणा सुरः॥ ५<br>यो वः प्राणो बलं यच्च या च वो वैरिताऽसुराः।<br>तत् कृत्वा हृदये चैव पालयध्वमिदं पुरम्॥ ६<br>महेश्वररथं ह्येकं सर्वप्राणेन भीषणम्।<br>विमुखीकुर्वतात्यर्थं यथा नोत्सृजते शरम्॥ ७<br>तत एवं कृतेऽस्माभिस्त्रिपुरस्यापि रक्षणे।<br>प्रतीक्षिष्यन्ति विवशाः पुष्ययोगं दिवौकसः॥ ८ऋषियो! इस प्रकार युद्धभूमिमें तारकासुरके मारे जानेपर दानवराज मय प्रमथोंको खदेड़कर भयभीत हुए दानवोंको सब तरहसे सान्त्वना देते हुए बोला—'अरे असुरेन्द्रो! इस समय तुम सभी महाबली दानवोंका जो कर्तव्य है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सब लोग ध्यान देकर सुनो। चन्द्रवदन दानवो! जिस समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रसे समन्वित होंगे, उस समय एक क्षणके लिये तीनों पुर एकमें मिल जायँगे। यह चन्द्रमाका पुष्य नक्षत्रसे सम्बन्ध होनेपर त्रिपुरके सम्मिलित होनेका काल मैंने ही निर्धारित कर रखा है, अतः उस समय तुमलोग निर्भय होकर नारदजीद्वारा बतलाये गये उपायोंका प्रयोग करो; क्योंकि उस समय जो कोई देवता त्रिपुरोंके सम्मिलित होनेका पता लगा लेगा, वह एक ही सुदृढ बाणसे इस त्रिपुरको चूर्ण कर डालेगा। इसलिये असुरो! तुमलोगोंमें जितनी प्राणशक्ति है, जितना बल है और देवताओंके साथ जितना वैर-विद्वेष है, वह सब हृदयमें विचारकर इस त्रिपुरकी रक्षामें जुट जाओ। तुमलोग एकमात्र महेश्वरके भीषण रथको पूरी शक्ति लगाकर ऐसा विमुख कर दो, जिससे वे बाण न छोड़ सकें। इस प्रकार हमलोगोंद्वारा त्रिपुरकी रक्षा सम्पन्न कर लेनेपर देवताओंको विवश होकर पुनः आनेवाले पुष्ययोगकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।'
निशम्य तन्मयस्यैकं दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>मुहुः सिंहरवं कृत्वा मयमूचुर्यमोपमाः॥ ९<br>प्रयत्नेन वयं सर्वे कुर्मस्तव प्रभाषितम्।<br>तथा कुर्मो यथा रुद्रो न मोक्ष्यति पुरे शरम्॥ १०<br>अद्य यास्यामः संग्रामे तद्रुद्रस्य जिघांसवः।<br>कथयन्ति दितेः पुत्रा हृष्टा भिन्नतनूरुहाः॥ ११<br>कल्पं स्थास्यति वा खस्थं त्रिपुरं शाश्वतं ध्रुवम्।<br>अदानवं वा भविता नारायणपदत्रयम्॥ १२<br>वयं न धर्मं हास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान्।<br>अदैवतमदैत्यं वा लोकं द्रक्ष्यन्ति मानवाः॥ १३मयका ऐसा कथन सुनकर यमराजके समान भीषण त्रिपुरनिवासी दानव बारम्बार सिंहनाद कर मयसे बोले—'राजन्! हम सब लोग प्रयत्नपूर्वक आपके कथनका पालन करेंगे और ऐसा कर्म कर दिखायेंगे, जिससे रुद्र त्रिपुरपर बाण नहीं छोड़ सकेंगे। हमलोग आज ही उस रुद्रका वध करनेके लिये संग्रामभूमिमें जा रहे हैं। या तो हमारा त्रिपुर कल्पपर्यन्त निश्चलरूपसे सर्वदाके लिये आकाशमें स्थिर रहेगा अथवा नारायणके तीन पदकी तरह यह दानवोंसे खाली हो जायगा। आप हमलोगोंको जिस कार्यमें नियुक्त कर देंगे, हमलोग उस कर्तव्यका कदापि त्याग नहीं करेंगे। आज मानव जगत्को देवता अथवा दैत्यसे रहित ही देखेंगे।'
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