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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 516 of 1098

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Page 516

५०६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उवाच शतपत्राक्षी सास्त्राक्षीव कृताञ्जलिः।<br>हव्यवाहन भार्याहं परस्य परतापन।<br>धर्मसाक्षी त्रिलोकस्य न मां स्प्रष्टुमिहार्हसि॥ ६१<br><br>शायितं च मया देव शिवया च शिवप्रभ।<br>शरेण प्रेहि मुक्त्वेदं गृहं च दयितं हि मे॥ ६२<br><br>एका पुत्रमुपादाय बालकं दानवाङ्गना।<br>हुताशनसमीपस्था इत्युवाच हुताशनम्॥ ६३<br><br>बालोऽयं दुःखलब्धश्च मया पावक पुत्रकः।<br>नार्हस्येनमुपादातुं दयितं षण्मुखप्रिय॥ ६४<br><br>काश्चित् प्रियान् परित्यज्य पीडिता दानवाङ्गनाः।<br>निपतन्त्यर्णवजले शिञ्जानविभूषणाः॥ ६५<br><br>तात पुत्रेति मातेति मातुलेति च विह्वलम्।<br>चक्रन्दुस्त्रिपुरे नार्यः पावकज्वालवेपिताः॥ ६६<br><br>यथा दहति शैलाग्निः साम्बुजं जलजाकरम्।<br>तथा स्त्रीवक्त्रपद्मानि चादहत् पुरेऽनलः॥ ६७गयी। कोई कमलनयनी नारी आँखोंमें आँसू भरे हुए हाथ जोड़कर कह रही थी—'हव्यवाहन! मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। परतापन! आप त्रिलोकीके धर्मके साक्षी हैं, अतः यहाँ मेरा स्पर्श करना आपके लिये उचित नहीं है।' (कोई कह रही थी—) 'शिवके समान कान्तिमान् अग्निदेव! मुझ पतिव्रताने इस घरमें अपने पतिको सुला रखा है, अतः इसे छोड़कर आप दूसरी ओरसे चले जाइये; क्योंकि यह गृह मुझे परम प्रिय है।' एक दानवपत्नी अपने शिशु पुत्रको गोदमें लेकर अग्निके समीप गयी और अग्निसे कहने लगी—'स्वामीकार्तिकके प्रेमी पावक! मुझे यह शिशु पुत्र बड़े दुःखसे प्राप्त हुआ है, अतः इसे ले लेना आपके लिये उचित नहीं है। यह मुझे परम प्रिय है।' कुछ पीड़ित हुई दानव-पत्नियों अपने पतियोंको छोड़कर समुद्रके जलमें कूद रही थीं। उस समय उनके आभूषणोंसे शब्द हो रहा था। त्रिपुरमें आगकी लपटोंके भयसे काँपती हुई नारियाँ 'हा तात!, हा पुत्र!, हा माता!, हा मामा!' कहकर विह्वलतापूर्वक करुण-क्रन्दन कर रही थीं। जैसे पर्वताग्नि (दावाग्नि) कमलोंसहित सरोवरको जला देती है उसी प्रकार अग्निदेव त्रिपुरमें स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंको जला रहे थे॥ ५५-६७॥
तुषारराशिः कमलाकराणां<br>यथा दहत्यम्बुजकानि शीते।<br>तथैव सोऽग्निस्त्रिपुराङ्गनानां<br>ददाह वक्त्रेक्षणपङ्कजानि॥ ६८जिस प्रकार शीतकालमें तुषारराशि कमलोंसे भरे हुए सरोवरोंके कमलोंको नष्ट कर देती है उसी तरह अग्निदेव त्रिपुर-निवासिनी नारियोंके मुख और नेत्ररूप कमलोंको जला रहे थे।
शराग्निपातात् समभिद्रुतानां<br>तत्राङ्गनानामतिकोमलानाम् ।<br>बभूव काञ्चीगुणनूपुराणा-<br>माक्रन्दितानां च रवोऽति मिश्रः॥ ६९त्रिपुरमें बाणाग्निके गिरनेसे भयभीत होकर भागती हुई अत्यन्त कोमलाङ्गी सुन्दरियोंकी करधनीकी लड़ियों और पायजेबोंका शब्द आक्रन्दनके शब्दोंसे मिलकर अत्यन्त भयंकर लग रहा था।
दग्धार्धचन्द्राणि सवेदिकानि<br>विशीर्णहर्म्याणि सतोरणानि।<br>दग्धानि दग्धानि गृहाणि तत्र<br>पतन्ति रक्षार्थमिवार्णवौघे॥ ७०जिनमें अर्धचन्द्रसे सुशोभित वेदिकाएँ जल गयी थीं तथा तोरणसहित अट्टालिकाएँ जलकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। ऐसे गृह जलते-जलते समुद्रमें इस प्रकार गिर रहे थे मानो वे रक्षाके लिये उसमें कूद रहे हों।
गृहैः पतद्भिर्ज्वलनावलीढै-<br>रासीत् समुद्रे सलिलं प्रतप्तम्।<br>कुपुत्रदोषैः प्रहतानुविद्धं<br>यथा कुलं याति धनान्वितस्य॥ ७१अग्निकी लपटोंसे झुलसे हुए गृहोंके समुद्रमें गिरनेसे उसका जल ऐसा संतप्त हो उठा था, जैसे सम्पत्तिशाली व्यक्तिका कुल कुपुत्रके दोषसे नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।