मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| * अध्याय १७२ * | ७०७ |
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| राजा च लभते राज्यमधनश्चोत्तमं धनम्।<br>क्षीणायुर्लभते चायुः पुत्रकामः सुतं तथा॥ ६८<br>यज्ञा वेदास्तथा कामास्तपांसि विविधानि च।<br>प्राप्नोति विविधं पुण्यं विष्णुभक्तो धनानि च॥ ६९<br>यद्यत्कामयते किञ्चित् तत्तल्लोकेश्वराद् भवेत्।<br>सर्वं विहाय य इमं पठेत् पौष्करकं हरेः॥ ७०<br>प्रादुर्भावं नृपश्रेष्ठ न तस्य ह्यशुभं भवेत्।<br>एष पौष्करको नाम प्रादुर्भावो महात्मनः।<br>कीर्तितस्ते महाभाग व्यासश्रुतिनिदर्शनात्॥ ७१ | राजाको राज्यकी, निर्धनको उत्तम धनकी, क्षीणायुको दीर्घायुकी तथा पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है। विष्णुभक्त मनुष्य यज्ञ, वेद, कामनापूर्ति, अनेकविध तप, विविध पुण्य और धनको प्राप्त करता है। नृपश्रेष्ठ! जो मनुष्य सबका परित्याग करके श्रीहरिके इस पौष्कर-प्रादुर्भावका पाठ करता है, वह जो-जो कामनाएँ करता है, वह सब कुछ उस लोकेश्वरभगवान्से प्राप्त हो जाता है और उसका कभी अमङ्गल नहीं होता। महाभाग! इस प्रकार मैंने तुमसे महात्मा विष्णुके पुष्कर या कमलके प्रादुर्भावका वर्णन कर चुका। यह व्यासके वचनों तथा श्रुतियोंका निदर्शन है॥ ६२—७१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पद्मोद्भवप्रादुर्भावो नामैकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके पद्मोद्भवप्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें एक सौ एकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७१॥
एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय
तारकामय-संग्रामकी भूमिका एवं भगवान् विष्णुका महासमुद्रके रूपमें वर्णन, तारकादि असुरोंके अत्याचारसे दुःखी होकर देवताओंकी भगवान् विष्णुसे प्रार्थना और भगवान्का उन्हें आश्वासन
| मत्स्य उवाच<br>विष्णुत्वं शृणु विष्णोश्च हरित्वं च कृते युगे।<br>वैकुण्ठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च॥ १<br>ईश्वरस्य हि तस्यैषा कर्मणां गहना गतिः।<br>सम्प्रात्यतीतान् भव्यांश्च शृणु राजन् यथातथम्॥ २<br>अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान् प्रभुः।<br>नारायणो ह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्यय एव च॥ ३<br>एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् सनातनः।<br>ब्रह्मा वायुश्च सोमश्च धर्मः शक्रो बृहस्पतिः॥ ४<br>अदितेरपि पुत्रत्वं समेत्य रविनन्दन।<br>एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजो विभुः॥ ५<br>प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रकारणम्।<br>वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम्॥ ६<br>प्रधानात्मा पुरा ह्येष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः।<br>सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुराकल्पे प्रजापतीन्॥ ७ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! अब मैं कृतयुगमें घटित हुए भगवान् विष्णुके विष्णुत्व एवं हरित्व, देवताओंमें वैकुण्ठत्व और मनुष्योंमें कृष्णत्वका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो। उस ईश्वरके कर्मोंकी यह गति बड़ी गहन है। इस समय तुम विष्णुके भूत एवं भावी अवतारोंके विषयमें यथार्थरूपसे श्रवण करो। जो ये ऐश्वर्यशाली अव्यक्तस्वरूप भगवान् हैं, वे ही व्यक्तरूपमें भी प्रकट होते हैं। वे ही नारायण अनन्तात्मा, सबके उत्पत्तिस्थान और अविनाशी भी कहे जाते हैं। ये सनातन नारायण श्रीहरि ब्रह्मा, वायु, सोम, धर्म, इन्द्र और वृहस्पति के रूपमें भी प्रकट होते हैं। रविनन्दन! ये सर्वव्यापी विष्णु अदितिके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रके अनुज 'उपेन्द्र' के नामसे विख्यात होते हैं। इन सर्वव्यापीका अदितिके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके दो कारण हैं—एक तो अदितिपर कृपा करना और दूसरा देवशत्रु दैत्यों, दानवों और राक्षसोंका वध करना। इन प्रधानात्मा प्रभुने सर्वप्रथम ब्रह्माको उत्पन्न किया। उन पूर्वपुरुषने पूर्व कल्पमें प्रजापतियोंकी सृष्टि की। |