BharatKosha
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 723 of 1098

Read in context
Page 723

* अध्याय १७४ * ७१३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः।<br>अन्ये हयगतास्तत्र गजस्कन्धगताः परे॥ २४<br><br>सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षेषु चापरे।<br>केचित्खरोष्ट्रयातारः केचिच्छ्वापदवाहनाः॥ २५<br><br>पत्तिनस्त्वपरे दैत्या भीषणा विकृताननाः।<br>एकपादार्धपादाश्च ननृत्युर्युद्धकाङ्क्षिणः॥ २६<br><br>आस्फोटयन्तो बहवः क्ष्वेडन्तश्च तथापरे।<br>हृष्टशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः॥ २७<br><br>ते गदापरिघैरुग्रैः शिलामुसलपाणयः।<br>बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति स्म देवताः॥ २८<br><br>पाशैः प्रासैश्च परिघैस्तोमेराङ्कुशपट्टिशैः।<br>चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः॥ २९<br><br>गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायसैः।<br>चक्रैश्च दैत्यप्रवराश्चक्रुरानन्दितं बलम्॥ ३०<br><br>एतद्दानवसैन्यं तत् सर्वं युद्धमदोत्कटम्।<br>देवानभिमुखे तस्थौ मेघानीकमिवोद्धतम्॥ ३१<br><br>तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं<br>वाय्वग्निशैलाम्बुदतोयकल्पम्।<br>बलं रणौघाभ्युदयेऽभ्युदीर्णं<br>युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे ॥ ३२था, हँसते हुए दैत्योंके आगे खड़ा हुआ। इस प्रकार अन्यान्य दानव भी क्रमशः सेनासहित कवच धारण करके युद्धके लिये प्रस्थित हुए। उनमें कुछ लोग घोड़ोंपर सवार थे तो कुछ लोग गजराजोंके कंधोंपर बैठे थे। दूसरे कुछ लोग सिंह, व्याघ्र, वराह और रीछोंपर सवार थे। कुछ गधे और ऊँटोंपर चढ़कर चल रहे थे तो किन्हींके वाहन चीते थे॥ १८—२५॥<br><br>दूसरे भीषण दैत्य, जिनमें कुछके मुख टेढ़े थे, किन्हींके एक पैर तथा किन्हींके आधा पैर ही था, युद्धकी अभिलाषासे पैदल ही नाचते हुए चल रहे थे। उन दानवश्रेष्ठोंमें कुछ ताल ठोंक रहे थे, बहुतेरे उछल-कूद रहे थे और कुछ हर्षित होकर सिंहनाद कर रहे थे। इस प्रकार वे दानवगण हाथोंमें भयंकर गदा, परिघ, शिला और मुसल धारण करके अपनी परिघाकार भुजाओंसे देवताओंको धमका रहे थे। उस समय श्रेष्ठ दैत्यगण पाश, भाला, परिघ, तोमर (लकड़ीका बना गोलाकार अस्त्र), अङ्कुश, पट्टिश, शतघ्नी (तोप), शतधार, मुद्गर, गण्डशैल, शैल, उत्तम लोहेके बने हुए परिघ और चक्रोंसे क्रीडा करते हुए दैत्यसेनाको आनन्दित करने लगे। इस प्रकार दानवोंकी वह सारी सेना युद्धके मदसे उन्मत्त हो देवताओंके सम्मुख खड़ी हुई, जो उमड़े हुए मेघोंकी सेना-सी प्रतीत हो रही थी। दानवोंकी वह अद्भुत एवं प्रचण्ड सेना, जो हजारों प्रधान दैत्योंसे भरी हुई तथा वायु, अग्नि, पर्वत और मेघके समान भीषण दीख रही थी, युद्धकी तैयारीके समय युद्धकी इच्छासे उन्मत्त हुई-सी शोभा पा रही थी॥ २६—३२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १७३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामय-संग्राममें एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७३॥


एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय

देवताओंका युद्धार्थ अभियान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br><br>श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तारो रविनन्दन।<br>सुराणामपि सैन्यस्य विस्तारं वैष्णवं शृणु॥ १<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ।<br>सबलाः सानुगाश्चैव सन्नह्यान्त यथाक्रमम्॥ २मत्स्यभगवान्ने कहा— रविनन्दन! तुम दैत्योंकी सेनाका विस्तार तो सुन ही चुके, अब देवताओंकी—विशेषकर विष्णुकी सेनाका विस्तार श्रवण करो। उस समय आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण और दोनों महाबली अश्विनीकुमार—इन सभीने क्रमशः अपनी-अपनी सेना और अनुयायियोंसहित कवच धारण कर लिया।