मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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| * अध्याय १७५ * | ७१७ |
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| पक्षाभ्यां चारुपत्राभ्यामावृत्य दिवि लीलया ।<br>युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवाम्बरम् ॥ ४५<br>नीललोहितपीताभिः पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम् ॥ ४६<br>अरुणावरजं श्रीमानारुह्य समरे विभुः ।<br>सुवर्णस्वर्णवपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम् ॥ ४७<br>तमन्वयुर्देवगणा मुनयश्च समाहिताः ।<br>गीर्भिः परममन्त्राभिस्तुष्टुवुश्च जनार्दनम् ॥ ४८<br>तद्वैश्रवणसंश्लिष्टं वैवस्वतपुरःसरम् ।<br>द्विजराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम् ॥ ४९<br>चन्द्रप्रभाभिर्विपुलं युद्धाय समवर्तत ।<br>स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति बृहस्पतिरभाषत ।<br>स्वस्त्यस्तु दानवानीके उशना वाक्यमाददे ॥ ५० ॥ | वे अपने दोनों सुन्दर पंखोंसे आकाशको उसी प्रकार लीलापूर्वक आच्छादित किये हुए थे, जैसे युगान्तके समय दो इन्द्रधनुषोंसे युक्त बादल आकाशको ढक लेते हैं। वे नीली, लाल और पीली पताकाओंसे सुशोभित थे, जो केतु (पताका)-के वेषमें छिपे हुए, विशालकाय और अरुणके छोटे भाई थे, उन सुन्दर वर्णवाले, सुनहले शरीरसे सुशोभित पक्षिश्रेष्ठ गरुडपर आरूढ़ होकर श्रीमान् भगवान् विष्णु समरभूमिमें उपस्थित हुए। फिर तो देवगणों तथा मुनियोंने सावधान-चित्तसे उनका अनुगमन किया और परमोत्कृष्ट मन्त्रोंसे युक्त वाणियोंद्वारा उन जनार्दनका स्तवन किया। इस प्रकार देवताओंकी वह विशाल सेना जब कुबेरसे युक्त, यमराजसे समन्वित, चन्द्रमासे सुरक्षित, इन्द्रसे सुशोभित और चन्द्रमाकी प्रभासे समलंकृत हो युद्धके लिये आगे बढ़ी, तब बृहस्पतिने कहा—'देवताओंका मङ्गल हो।' इसी प्रकार दानव-सेनामें भी शुक्राचार्यने 'दानवोंका कल्याण हो' ऐसा वचन उच्चारण किया॥ ४०—५०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे तारकामयसंग्रामे चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकामयसंग्राममें एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १७४ ॥
एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
देवताओं और दानवोंका घमासान युद्ध, मयकी तामसी माया, और्वाग्निकी उत्पत्ति और महर्षि ऊर्वद्वारा हिरण्यकशिपुको उसकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच<br>ताभ्यां बलाभ्यां संजज्ञे तुमुलो विग्रहस्तदा ।<br>सुराणामसुराणां च परस्परजयैषिणाम् ॥ १<br>दानवा देवतैः सार्धं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>समीयुर्युध्यमाना वै पर्वता इव पर्वतैः ॥ २<br>तत्सुरासुरसंयुक्तं युद्धमत्यद्भुतं बभौ ।<br>धर्माधर्मसमायुक्तं दर्पेण विनयेन च ॥ ३<br>ततो रथैर्विप्रयुक्तैर्वारणैश्च प्रचोदितैः ।<br>उत्पतद्भिश्च गगनमसिहस्तैः समंततः ॥ ४<br>क्षिप्यमाणैश्च मुसलैः सम्पतद्भिश्च सायकैः ।<br>चापैर्विस्फार्यमाणैश्च पात्यमानैश्च मुद्गरैः ॥ ५ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**रविनन्दन! तदनन्तर परस्पर विजयकी अभिलाषावाले देवताओं और दानवोंकी उन दोनों सेनाओंमें घमासान युद्ध होने लगा। नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे लैस हुए दानवगण देवताओंके साथ युद्ध करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये। उस समय वे ऐसा प्रतीत हो रहे थे मानो पर्वत पर्वतोंके साथ भिड़ गये हों। देवताओं और असुरोंके बीच छिड़ा हुआ वह युद्ध धर्म, अधर्म, दर्प और विनयसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त अद्भुत लग रहा था। उस समय रथोंको पृथक्-पृथक् आगे बढ़ाया जा रहा था, हाथियोंको उत्तेजित किया जा रहा था, चारों ओर सैनिक हाथमें तलवार लिये हुए आकाशमें उछल रहे थे, मुसल फेंके जा रहे थे, बाणोंकी वर्षा हो रही थी, धनुषोंका टंकार हो रहा था, मुद्गर |