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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

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Page 730
७२०* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च दन्तोलूखलिनस्तथा।<br>अश्मकुट्टा दशतपाः पञ्चातपसहाश्च ये॥ ३५<br>एते तपसि तिष्ठन्ति व्रतैरपि सुदुष्करैः।<br>ब्रह्मचर्यं पुरस्कृत्य प्रार्थयन्ति परां गतिम्॥ ३६<br>ब्रह्मचर्याद् ब्राह्मणस्य ब्राह्मणत्वं विधीयते।<br>एवमाहुः परे लोके ब्रह्मचर्यविदो जनाः॥ ३७<br>ब्रह्मचर्ये स्थितं धैर्यं ब्रह्मचर्ये स्थितं तपः।<br>ये स्थिता ब्रह्मचर्ये तु ब्राह्मणास्ते दिवि स्थिताः॥ ३८<br>नास्ति योगं विना सिद्धिर्न वा सिद्धिं विना यशः।<br>नास्ति लोके यशोमूलं ब्रह्मचर्यात् परं तपः॥ ३९<br>यो निगृह्येन्द्रियग्रामं भूतग्रामं च पञ्चकम्।<br>ब्रह्मचर्येण वर्तेत किमतः परमं तपः॥ ४०जो लोग केवल जल पीकर, वायुका आहार कर, दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेकर, पत्थरपर कुटे हुए पदार्थोंको खाकर, दस या पाँच स्थानोंपर अग्नि जलाकर उनके मध्यमें बैठकर तपस्या करनेवाले हैं तथा सुदुष्कर व्रतोंका पालन करते हुए तपस्यामें निरत हैं, वे लोग भी ब्रह्मचर्यको प्रधान मानकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। परलोकमें ब्रह्मचर्यके महत्त्वको जाननेवाले लोग ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मचर्यके पालनसे ब्राह्मणको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्यमें धैर्य स्थित है, ब्रह्मचर्यमें तप स्थित है तथा जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यमें स्थित रहते हैं, वे मानो स्वर्गमें स्थित हैं। लोकमें योगके बिना सिद्धि और सिद्धिके बिना यशकी प्राप्ति नहीं हो सकती तथा यशःप्राप्तिका मूल कारण परम तप ब्रह्मचर्यके बिना नहीं हो सकता। जो इन्द्रियसम्मूह और पञ्चमहाभूतोंको वशमें करके ब्रह्मचर्यका पालन करता है, उसके लिये इससे बढ़कर और कौन-सा तप हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं॥ ३१—४०॥
अयोगे केशधारणमसंकल्पे व्रतक्रिया।<br>अब्रह्मचर्या चर्या च त्रयं स्याद् दम्भसंज्ञकम्॥ ४१<br>क्व दाराः क्व च संयोगः क्व च भावविपर्ययः।<br>नन्वियं ब्रह्मणा सृष्टा मनसा मानसी प्रजा॥ ४२<br>यद्यस्ति तपसो वीर्यं युष्माकं विदितात्मनाम्।<br>सृजध्वं मानसान् पुत्रान् प्राजापत्येन कर्मणा॥ ४३<br>मनसा निर्मिता योनिराधातव्या तपस्विभिः।<br>न दारयोगो बीजं वा व्रतमुक्तं तपस्विनाम्॥ ४४<br>यदिदं लुप्तधर्मार्थं युष्माभिरिह निर्भयैः।<br>व्याहृतं सद्‌भिरत्यर्थमसद्‌भिरिव मे मतम्॥ ४५<br>वपुर्दीप्तान्तरात्मानमेतत् कृत्वा मनोमयम्।<br>दारयोगं विना स्रक्ष्ये पुत्रमात्मतनूरुहम्॥ ४६<br>एवमात्मानमात्मा मे द्वितीयं जनयिष्यति।<br>वन्येनानेन विधिना दिधिक्षन्तमिव प्रजाः॥ ४७<br>ऊर्वस्तु तपसाविष्टो निवेश्योरुं हुताशने।<br>ममन्थैकेन दर्भेण सुतस्य प्रभवारणिम्॥ ४८<br>तस्योरुं सहसा भित्त्वा ज्वालामाली ह्यनिन्धनः।<br>जगतो दहनाकाङ्क्षी पुत्रोऽग्निः समपद्यत॥ ४९'योगाभ्यासके बिना जटा धारण करना, संकल्पके बिना व्रताचरण और ब्रह्मचर्य-हीन दशामें नियमोंका पालन—ये तीनों दम्भ कहे जाते हैं। कहाँ स्त्री, कहाँ स्त्री-संयोग और कहाँ स्त्री-पुरुषका भाव-परिवर्तन? परंतु इन सबके अभावमें ही ब्रह्माने इस सृष्टिको मनसे उत्पन्न की है और सारी प्रजाएँ भी मनसे ही प्रादुर्भूत हुई हैं। इसलिये आत्मज्ञानी आपलोगोंमें यदि तपस्याका बल है तो प्रजापतिके कर्मानुसार आपलोग भी मानसिक पुत्रोंकी सृष्टि कीजिये। तपस्वियोंको मानसिक संकल्पद्वारा योनिका निर्माण कर उसमें आधान करना चाहिये। उनके लिये स्त्री-संयोग, बीज और व्रत आदिका विधान नहीं है। आपलोगोंने मेरे सामने निर्भय होकर जो यह धर्म और अर्थसे हीन वचन कहा है, यह सत्पुरुषोंद्वारा अत्यन्त गर्हित है। मेरे विचारसे तो यह अज्ञानियोंकी उक्ति-जैसा है। मैं अपने इस उद्दीप्त अन्तरात्मावाले शरीरको मनोमय करके स्त्री-संयोगके बिना ही अपने शरीरसे पुत्रकी सृष्टि करूँगा। इस प्रकार मेरा आत्मा इस वन्य (वानप्रस्थ) विधिके अनुसार प्रजाओंको जला देनेवाले दूसरे आत्मा (पुत्र)-को उत्पन्न करेगा।' तत्पश्चात् ऊर्वने तपस्यामें संलग्न होकर अपनी जाँघको अग्निमें डालकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये एक कुशसे अरणि-मन्थन किया। तब सहसा उनकी जाँघका भेदन कर इन्धनरहित होनेपर भी ज्वालाओंसे युक्त अग्नि जगत्‌को जला देनेकी इच्छासे पुत्ररूपमें प्रकट हुआ।