मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 787 of 1098
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| * अध्याय १८६ * | ७७७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सदेवासुरगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तपस्तप्त्वा महाराज सिद्धिं च परमां गताः॥ १३<br>यत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।<br>उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥ १४<br>जलेश्वरे नरः स्नात्वा पिण्डं दत्त्वा यथाविधि।<br>पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १५ | महाराज! इसके तटपर देवता, असुर, गन्धर्व और तपस्यामें रत ऋषिगणोंने तपस्या कर परम सिद्धिको प्राप्त किया है। राजन्! यदि नियमनिष्ठ एवं जितेन्द्रिय मनुष्य नर्मदामें स्नानकर एक रात उपवास करके वहाँ निवास करे तो वह अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है। यदि मनुष्य जलेश्वर (जलेश्वर-तीर्थ)-में स्नानकर पिण्ड-दान करता है तो उसके पितर विधिपूर्वक प्रलयकालपर्यन्त तृप्त रहते हैं॥ ८—१५॥ |
| पर्वतस्य समंतात् तु रुद्रकोटिः प्रतिष्ठिता।<br>स्नात्वा यः कुरुते तत्र गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ १६<br>प्रीतस्तस्य भवेच्छर्वो रुद्रकोटिर्न संशयः।<br>पश्चिमे पर्वतस्यान्ते स्वयं देवो महेश्वरः॥ १७<br>तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।<br>पितृकार्यं च कुर्वीत विधिवन्नियतेन्द्रियः॥ १८<br>तिलोदकेन तत्रैव तर्पयेत् पितृदेवताः।<br>आसप्तमं कुलं तस्य स्वर्गे मोदेत पाण्डव॥ १९<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि स्वर्गलोके महीयते।<br>अप्सरोगणसंकीर्णे सिद्धचारणसेविते॥ २०<br>दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यालङ्कारभूषितः।<br>ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो जायते विपुले कुले॥ २१<br>धनवान् दानशीलश्च धार्मिकश्चैव जायते।<br>पुनः स्मरति तत् तीर्थं गमनं तत्र रोचते॥ २२<br>कुलानि तारयेत् सप्त रुद्रलोकं स गच्छति।<br>योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा॥ २३<br>विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता।<br>षष्टितीर्थसहस्त्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च॥ २४<br>सर्वं तस्य समंतात् तु तिष्ठत्यमरकण्टके। | अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर करोड़ों रुद्र प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नानकर गन्ध, माल्य और चन्दनॉंसे शिवजीकी पूजा करता है, उसपर भगवान् रुद्रकोटि प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें संदेह नहीं है। पाण्डुनन्दन! उस पर्वतके पश्चिम भागके अन्तमें साक्षात् महेश्वरदेव विराजमान हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नान करके पवित्र हो जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी एवं इन्द्रियोंको वशमें करके विधिपूर्वक पितृकार्य करता है तथा तिल-जलसे पितरों और देवताओंका तर्पण करता है, उसके सात पीढ़ीहतकके पितर स्वर्गमें आनन्दका भोग करते हैं। साथ ही वह व्यक्ति दिव्य गन्धोंके अनुलेपनसे युक्त तथा दिव्य अलंकारोंसे विभूषित हो साठ हजार वर्षोंतक अप्सरासमूहोंसे परिव्यास एवं सिद्धों और चारणोंसे सेवित स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदनन्तर स्वर्गसे भ्रष्ट होनेपर प्रतिष्ठित कुलमें जन्म ग्रहण करता है। यहाँ वह धनवान्, दानशील और धार्मिक होता है। वह उस तीर्थका पुनः-पुनः स्मरण करता है तथा उसको वहाँ जाना प्रिय लगता है। वहाँ जाकर वह सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और रुद्रलोकको चला जाता है। राजेन्द्र! ऐसी ख्याति है कि यह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे अधिक लम्बी और दो योजन चौड़ी है। साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ इस अमरकण्टकके चारों ओर वर्तमान हैं॥ १६—२४ १/२॥ |
| ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः॥ २५<br>सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः।<br>एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् परित्यजेत्॥ २६<br>तस्य पुण्यफलं राजञ्शृणुष्वावहितो मम।<br>शतं वर्षसहस्त्राणां स्वर्गे मोदेत पाण्डव॥ २७ | राजन्! जो मनुष्य ब्रह्मचारी, पवित्र, क्रोधजयी, जितेन्द्रिय, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे रहित, सभी प्राणियोंके हितमें तत्पर—इस प्रकार सभी सदाचारोंसे युक्त होकर यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करता है, उसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे आप मुझसे सावधान होकर सुनिये। |