मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| * अध्याय १८८ * | ७८७ |
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| धूमेनाकुलिता सा तु प्रसुप्ता धरणीतले।<br>अन्या गृहीतहस्ता तु सखि दह्यति बालिका ॥ ४५<br>अनेकदिव्यरत्नाढ्या दृष्ट्वा दहनमोहिता।<br>शिरसि ह्यञ्जलिं कृत्वा विज्ञापयति पावकम् ॥ ४६<br>भगवन् यदि वैरं ते पुरुषेष्वपकारिषु।<br>स्त्रियः किमपराध्यन्ते गृहपञ्जरकोकिलाः ॥ ४७<br>पाप निर्दय निर्लज्ज कस्ते कोपः स्त्रियः प्रति।<br>न दाक्षिण्यं न ते लज्जा न सत्यं शौर्यवर्जितः ॥ ४८<br>अनेन ह्यापसर्गेण तूपालम्भं शिखिन्यदात्।<br>किं त्वया न श्रुतं लोके ह्यवध्याः शत्रुयोषितः ॥ ४९<br>किंतु तुभ्यं गुणा होते दहनोत्सादनं प्रति।<br>न कारुण्यं भयं वापि दाक्षिण्यं न स्त्रियः प्रति ॥ ५०<br>दयां कुर्वन्ति म्लेच्छापि दहन्तीं वीक्ष्य योषितम्।<br>म्लेच्छानामपि कष्टोऽसि दुर्निवारो ह्यचेतनः ॥ ५१<br>एते चैव गुणास्तुभ्यं दहनोत्सादनं प्रति।<br>आसामपि दुराचार स्त्रीणां किं ते निपातने ॥ ५२<br>दुष्ट निर्घृण निर्लज्ज हुताशिन् मन्दभाग्यक।<br>निराशत्वं दुरावास बलाद् दहसि निर्दय ॥ ५३<br>एवं विलपमानास्ता जल्पन्त्यश्च बहून्यपि।<br>अन्याः क्रोशन्ति संक्रुद्धा बालशोकेन मोहिताः ॥ ५४<br>दहते निर्दयो वह्निः संक्रुद्धः पूर्वशत्रुवत्।<br>पुष्करिण्यां जलं दग्धं कूपेष्वपि तथैव च ॥ ५५<br>अस्मान् संदह्य म्लेच्छ त्वं कां गतिं प्रापयिष्यसि।<br>एवं प्रलपितं तासां श्रुत्वा देवो विभावसुः।<br>मूर्तिमान् सहसोत्थाय वह्निर्वचनमब्रवीत् ॥ ५६ | धुएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर सो गयी। अन्य स्त्री अपनी सखीका हाथ पकड़कर कह रही हैं—'सखि! बालिका जल रही है।' कोई अनेक दिव्य रत्नोंसे अलंकृत नारी अग्निको देखकर मोहित हो गयी, तब वह सिरपर हाथ जोड़कर अग्निसे प्रार्थना करने लगी—'भगवन्! यदि तुम्हारा अपकारी पुरुषोंसे वैर है तो घरके पिंजरेमें कोयलके समान आबद्ध स्त्रियोंने तुम्हारा क्या अपराध किया है? अरे पापी! तुम तो बड़े निर्दयी और निर्लज्ज हो। स्त्रियोंके प्रति यह तुम्हारा कैसा क्रोध है! अरे कायर! न तो तुममें कुशलता है, न लज्जा है और न सत्यता है।' वह ऐसे आक्षेपयुक्त वाक्योंसे अग्निको उलाहना देने लगी। (फिर दूसरी कहने लगी—) 'क्या तुमने यह नहीं सुना है कि शत्रुको स्त्रियाँ भी अवध्य होती हैं? क्या जलाना और नाश करना ये ही तुम्हारे गुण हैं? तुम्हारेमें स्त्रियोंके प्रति दया, भय अथवा उदारता नहीं है। म्लेच्छगण भी स्त्रियोंको जलती हुई देखकर उनपर दया करते हैं। तुम तो म्लेच्छोंसे भी बढ़कर हृदयशून्य दुर्निवार कष्ट हो। दुराचारिन्! इन स्त्रियोंको मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा? क्या जलाना और मारना ये ही तुम्हारे गुण हैं? दुष्ट हुताशिन्! तुम बड़े दयाहीन, निर्लज्ज, अभागा, कठोर और कपटी हो। अरे निर्दय! तुम क्यों बलपूर्वक स्त्रियोंको जला रहे हो?' इस प्रकार वे स्त्रियाँ अनेकों प्रकारसे विलाप करती हुई चीत्कार कर रही थीं? अन्य कुछ स्त्रियाँ बालशोकसे मोहित होकर विलाप कर रही थीं। यह निष्ठुर अग्नि क्रुद्ध होकर पुराने शत्रुके समान हमलोगोंको जला रहा है। पुष्करिणियों और कुओंके भी जल सूख गये। अरे म्लेच्छ! हमलोगोंको जलाकर तुम किस गतिको प्राप्त होगे? इस प्रकार उनका प्रलाप सुनकर अग्निदेव सहसा मूर्तिमान् होकर उठ खड़े हुए और इस प्रकार बोले॥ ४०–५६॥ | | अग्निरुवाच | अग्निदेवने कहा— | | स्ववशो नैव युष्माकं विनाशं तु करोम्यहम्।<br>अहमादेशकर्ता वै नाहं कर्तास्म्यनुग्रहम् ॥ ५७<br>रुद्रक्रोधसमाविष्टो विचरामि यथेच्छया।<br>ततो बाणो महातेजास्त्रिपुरं वीक्ष्य दीपितम् ॥ ५८<br>सिंहासनस्थः प्रोवाच ह्यहं देवैर्विनाशितः।<br>अल्पसत्त्वैर्दुराचारैरीश्वरस्य निवेदितम् ॥ ५९ | मैं अपनी इच्छाके अनुसार तुमलोगोंका विनाश नहीं कर रहा हूँ, अपितु मैं आदेशका पालक हूँ। मैं अनुग्रहका कर्ता नहीं हूँ। मैं रुद्रके क्रोधसे आविष्ट होकर इच्छानुसार विचरण कर रहा हूँ। तदनन्तर सिंहासनपर बैठा हुआ महातेजस्वी बाण त्रिपुरको जलता हुआ देखकर बोला—'मैं देवताओंन्द्वारा विनष्ट कर दिया गया। उस स्वल्पबलशाली दुराचारियोंने शंकरसे निवेदन |