मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
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| दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव स्नानाद् दानात् तपो जपात् ।<br>होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थं महाफलम् ॥ १३<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम् ।<br>चाणक्यो नाम राजर्षिः सिद्धिं तत्र समागतः ॥ १४<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं योजनं वृत्तसंस्थितम् ।<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १५<br>पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।<br>जगतीदर्शनाच्चैव भ्रूणहत्यां व्यपोहति ॥ १६<br>अहं तत्र ऋषिश्रेष्ठ तिष्ठामि ह्युमया सह ।<br>वैशाखे चैत्रमासे तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ १७<br>कैलासाच्चापि निष्क्रम्य तत्र संनिहितो ह्यहम् । | यह शुक्लतीर्थ दर्शन, स्पर्श, स्नान, दान, तप, जप, हवन और उपवास करनेसे महान् फलदायक होता है। यह महान् पुण्यदायक शुक्लतीर्थ नर्मदामें अवस्थित है। चाणक्य नामक राजर्षिने यहीं सिद्धि प्राप्त की थी। यह विशाल क्षेत्र एक योजन परिमाणका गोलाकार है। यह शुक्लतीर्थ महापुण्यको प्रदान करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। यह यहाँ स्थित वृक्षके अग्रभागको देखनेसे ब्रह्महत्या और यहाँकी भूमिके दर्शन करनेसे भ्रूणहत्याके पापको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ! मैं वहाँ उमाके साथ निवास करता हूँ। चैत्र तथा वैशाख-मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं कैलाससे भी आकर यहाँ उपस्थित रहता हूँ॥ ९—१७ ½ ॥ | | दैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा ॥ १८<br>गणाश्चाप्सरसो नागाः सर्वे देवाः समागताः ।<br>गगनस्थास्तु तिष्ठन्ति विमानैः सार्वकामिकैः ॥ १९<br>शुक्लतीर्थं तु राजेन्द्र ह्यागता धर्मकाङ्क्षिणः ।<br>रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा ॥ २०<br>आजन्मजनितं पापं शुक्लं तीर्थं व्यपोहति ।<br>स्नानं दानं महापुण्यं मार्कण्ड ऋषिसत्तम ॥ २१<br>शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ।<br>पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः ॥ २२<br>अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति ।<br>तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैर्दानेन वा पुनः ॥ २३<br>देवार्चनेन या पुष्टिर्न सा क्रतुशतैरपि ।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ २४<br>घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम् ।<br>एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदेश्वरात् पदात् ॥ २५<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यमृषिसिद्धनिषेवितम् ।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्न पुनर्जन्मभाग् भवेत् ॥ २६<br>स्नात्वा वै शुक्लतीर्थे तु ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम् ।<br>कपालपूरणं कृत्वा तुष्यत्यत्र महेश्वरः ॥ २७ | राजेन्द्र! दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, गण, अप्सराएँ और नाग—ये सभी देवगण आकर सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर आरूढ़ हो गगनमें स्थित रहते हैं। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले ये सभी शुक्लतीर्थमें आते हैं; क्योंकि जैसे धोबी मलिन वस्त्रको जलसे धोकर उज्ज्वल कर देता है, उसी तरह शुक्लतीर्थ जन्मसे लेकर तबतकके किये गये पापोंको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! यहाँका स्नान और दान महान् पुण्यफलको देनेवाले होते हैं। शुक्लतीर्थसे श्रेष्ठ तीर्थ न हुआ है और न होगा। मानव बचपनमें किये गये पाप-कर्मोंको शुक्लतीर्थमें एक दिन-रात उपवास करके नष्ट कर देता है। यहाँ तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, दान और देवार्चनसे जो पुष्टि प्राप्त होती है, वह (अन्यत्र किये गये) सैकड़ों यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। यहाँ कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास कर परमेश्वर महादेवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे वह अपने इक्कीस पीढ़ियोंतकके पूर्वजोंके साथ महादेवके स्थानसे च्युत नहीं होता। राजन्! ऋषियों और सिद्धोंद्वारा सेवित यह शुक्लतीर्थ महान् पुण्यदायक है। वहाँ स्नान करनेसे मानव पुनर्जन्मका भागी नहीं होता। शुक्लतीर्थमें स्नानकर वृषभध्वजकी पूजा करे और कपालको भर दे, ऐसा करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १८—२७॥ |