मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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- अध्याय १९६ *
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| अङ्गिरा दमवाहश्च तथा चैवाप्युरुक्षयः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ २९ | प्रवर बतलाये गये हैं—अङ्गिरा, दमवाह्य तथा उरुक्षय। इन गोत्रवालोंमें परस्पर विवाह नहीं होता॥ २१—२९॥ |
| संकृतिश्च त्रिमाष्टिश्च मनुः सम्बधिरेव वा।<br>तण्डिश्चेनातकिश्चैव तैलका दक्ष एव च॥ ३०<br>नारायणिर्शाषिणिश्च लौक्षिर्गार्ग्यहरिस्तथा।<br>गालवश्च अनेहश्च सर्वेषां प्रवरो मतः॥ ३१<br>अङ्गिराः संकृतिश्चैव गौरवीतिस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ३२<br>कात्यायनो हरितकः कौत्सः पिंगस्तथैव च।<br>हण्डिदासो वात्स्यायनिर्माद्रिमौलिः कुबेरणिः॥ ३३<br>भीमवेगः शाश्वदर्भिः सर्वे त्रिप्रवराः स्मृताः।<br>अङ्गिरा बृहदश्वश्च जीवनाश्वस्तथैव च॥ ३४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>बृहदुक्थो वामदेवस्तथा त्रिप्रवरा मताः॥ ३५<br>अङ्गिरा बृहदुक्थश्च वामदेवस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ ३६<br>कुत्सगोत्रोद्भवाश्चैव तथा त्रिप्रवरा मताः।<br>अङ्गिराश्च सदस्युश्च पुरुकुत्सस्तथैव च।<br>कुत्साः कुत्सैरवैवाह्या एवमाहुः पुरातनाः॥ ३७<br>रथीतराणां प्रवरास्त्यार्षेयाः परिकीर्तिताः।<br>अङ्गिराश्च विरूपश्च तथैव च रथीतरः।<br>रथीतरा ह्यवैवाह्या नित्यमेव रथीतरैः॥ ३८<br>विष्णुसिद्धिः शिवमत्तिर्जतृणः कतृणस्तथा।<br>पुत्रवश्च महातेजास्तथा वैरपरायणः॥ ३९<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप।<br>अङ्गिराश्च विरूपश्च वृषपर्वस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४० | संकृति, त्रिमाष्टि, मनु, सम्बधि, तण्डि, एनातकि (नाचिकेत), तैलक, दक्ष, नारायणिशार्षिणि, लौक्षि, गार्ग्य, हरि, गालव तथा अनेह—इन सबके प्रवर अङ्गिरा, संकृति तथा गौरवीति माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। कात्यायन, हरितक, कौत्स, पिङ्ग, हण्डिदास, वात्स्यायनि, माद्रि, मौलि, कुबेरणि, भीमवेग तथा शाश्वदर्भि—इन सभीके तीन प्रवर कहे गये हैं। उनके नाम हैं—अङ्गिरा, बृहदश्व तथा जीवनाश्व। इनके वंशवालोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। बृहदुक्थ तथा वामदेवके भी तीन प्रवर माने गये हैं। उनके नाम है—अङ्गिरा, बृहदुक्थ तथा वामदेव। इन वंशवालोंमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। कुत्सगोत्रमें उत्पन्न होनेवालोंके तीन प्रवर हैं—अङ्गिरा, सदस्यु तथा पुरुकुत्स। प्राचीन लोग बतलाते हैं कि कुत्सगोत्रवालोंसे कुत्सगोत्रवालोंका विवाह नहीं होता। रथीतरके वंशमें उत्पन्न होनेवालोंके भी तीन प्रवर हैं—अङ्गिरा, विरूप तथा रथीतर। ये लोग आपसमें विवाह नहीं करते। विष्णुसिद्धि, शिवमत्ति, जतृण, कतृण, महातेजस्वी पुत्र तथा वैरपरायण—ये सभी अङ्गिरा, विरूप और वृषपर्व—इन तीन ऋषियोंके प्रवरवाले माने गये हैं। राजन्! इन ऋषियोंके वंशमें परस्पर विवाह-कर्म नहीं होता॥ ३०—४०॥ |
| सात्यमुग्रिर्महातेजा हिरण्यस्तम्बिमुद्गलौ।<br>त्र्यार्षेयो हि मतस्तेषां सर्वेषां प्रवरो नृप॥ ४१<br>अङ्गिरा मत्स्यदग्धश्च मुद्गलश्च महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४२ | महातेजस्वी सात्यमुग्रि, हिरण्यस्तम्बि तथा मुद्गल—ये सभी अङ्गिरा, मत्स्यदग्ध तथा महातपस्वी मुद्गल—इन तीन ऋषियोंके प्रवर माने गये हैं। इन तीन ऋषियोंके गोत्रोंमें उत्पन्न होनेवालोंका परस्पर विवाह नहीं होता। |
| हंसजिह्वो देवजिह्वो ह्यग्निजिह्वो विराडपः।<br>अपाग्नेयस्त्वश्वयुश्च परण्यस्ता विमौद्गलाः॥ ४३ | हंसजिह्व, देवजिह्व, अग्निजिह्व, विराडप, अपाग्नेय, अश्वयु, परण्यस्त तथा विमौद्गल— |