मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
Page 845 of 1098
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* अध्याय २०४ * ८३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आकल्पकालिकी तृप्तिस्तेनास्माकं भविष्यति।<br>दाता सर्वेषु लोकेषु कामचारो भविष्यति॥ ९<br>आभूतसम्प्लवं कालं नात्र कार्या विचारणा।<br>यदेतत्पञ्चकं तस्मादेकेनापि वयं सदा॥ १०<br>तृप्तिं प्राप्स्याम चानन्तां किं पुनः सर्वसम्पदा।<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं दद्यात् कृष्णाजिनं च यः॥ ११ | इन खाद्य पदार्थोंसे हमलोगोंको कल्पपर्यन्त तृप्ति बनी रहती है और दाता प्रलयकालपर्यन्त सभी लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरण करता है—इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। पूर्वकथित इन पाँचोंमेंसे एकसे भी हमलोग सदा अनन्त तृप्ति प्राप्त करते हैं, फिर सभीके द्वारा करनेपर तो कहना ही क्या है? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो कृष्णमृगचर्मका दान देगा?॥ ९—११॥ |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।<br>प्रसूयमानां यो धेनुं दद्याद् ब्राह्मणपुङ्गवे॥ १२<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं वृषभं यः समुत्सृजेत्।<br>सर्ववर्णविशेषेण शुक्लं नीलं वृषं तथा॥ १३<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः कुर्याच्छ्रद्धयान्वितः।<br>सुवर्णदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च॥ १४<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं कश्चित् पुरुषसत्तमः।<br>कूपारामतडागानां वापीनां यश्च कारकः॥ १५<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं सर्वभावेन यो हरिम्।<br>प्रयायाच्छरणं विष्णुं देवेशं मधुसूदनम्॥ १६<br>अपि नः स कुले भूयात् कश्चिद् विद्वान् विचक्षणः।<br>धर्मशास्त्राणि यो दद्याद् विधिना विदुषामपि॥ १७<br>एतावदुक्तं तव भूमिपाल<br>श्राद्धस्य कल्पं मुनिसम्प्रदिष्टम्।<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च<br>लोकेषु मुख्यत्वकरं तथैव॥ १८<br>इत्येतां पितृगाथां तु श्राद्धकाले तु यः पितॄन्।<br>श्रावयेत्तस्य पितरो लभन्ते दत्तमक्षयम्॥ १९ | क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा नरश्रेष्ठ पैदा होगा, जो ब्राह्मणश्रेष्ठको व्याती हुई गायका दान देगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो वृषभका उत्सर्ग करेगा? वह वृष विशेषरूपसे सभी रङ्गोंकी अपेक्षा नील अथवा शुक्ल वर्णका होना चाहिये। क्या हमलोगोंके कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो श्रद्धासम्पन्न होकर सुवर्ण-दान, गो-दान और पृथ्वीदान करेगा? क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा पुरुषश्रेष्ठ पैदा होगा, जो कूप, बगीचा, सरोवर और बावलियोंका निर्माण करायेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म ग्रहण करेगा जो सभी प्रकारसे मधु दैत्यके नाशक देवेश भगवान् विष्णुकी शरण ग्रहण करेगा? क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा प्रतिभाशाली विद्वान् होगा, जो विद्वानोंको विधिपूर्वक धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका दान देगा? भूपाल! मैंने इस प्रकार आपसे मुनियोंद्वारा कही गयी इस श्राद्धकर्मकी विधिको वर्णन कर दिया। यह पापनाशिनी, पुण्यको बढ़ानेवाली एवं संसारमें प्रमुखता प्रदान करनेवाली है। जो श्राद्धके समय पितरोंको यह पितृगाथा सुनाता है उसके पितर दिये गये पदार्थोंको अक्षयरूपमें प्राप्त करते हैं॥ १२—१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृगाथाकीर्तनं नाम चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृगाथानुकीर्तन नामक दो सौ चारवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०४॥