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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

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Page 858

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* मत्स्यपुराण *


दो सौ दसवाँ अध्याय

यमराजका सत्यवान्‌के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
तस्य पाटयतः काष्ठं जज्ञे शिरसि वेदना।<br>स वेदनार्तः संगम्य भार्यां वचनमब्रवीत्॥ १<br>आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना।<br>तमश्च प्रविशामीव न च जानामि किञ्चन॥ २<br>त्वदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा स्वप्तुमिच्छामि साम्प्रतम्।<br>राजपुत्रीमेवमुक्त्वा तदा सुष्वाप पार्थिव ॥ ३<br>तदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा निद्रयाऽऽविलोचनः।<br>पतिव्रता महाभागा ततः सा राजकन्यका॥ ४<br>ददर्श धर्मराजं तु स्वयं तं देशमागतम्।<br>नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम्॥ ५<br>विद्युल्लतानिबद्धाङ्गं सतोयमिव तोयदम्।<br>किरीटेनार्कवर्णेन कुण्डलाभ्यां विराजितम्॥ ६<br>हारभारार्पितोरस्कं तथाङ्गदविभूषितम्।<br>तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना॥ ७<br>स तु सम्प्राप्य तं देशं देहात् सत्यवतस्तदा।<br>अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं पाशबद्धं वशं गतम्॥ ८<br>आकृष्य दक्षिणामाशां प्रययौ सत्वरं तदा।<br>सावित्र्यपि वरारोहा दृष्ट्वा तं गतजीवितम्॥ ९<br>अनुवव्राज गच्छन्तं धर्मराजमतन्द्रिता।<br>कृताञ्जलिरुवाचाथ हृदयेन प्रवेपता॥ १०<br>इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम्।<br>गुरुशुश्रूषया चैव ब्रह्मलोकं समश्नुते॥ ११<br>सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः।<br>अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥ १२<br>यावत् त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरे।<br>तेषां च नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः॥ १३<br>तेषामनुपरोधेन पारतन्त्र्यं यदा चरेत्।<br>तत्तन्निवेदयेत् तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः।<br>त्रिष्वप्येतेषु कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते॥ १४राजन्‌! लकड़ी काटते हुए सत्यवान्‌के सिरमें पीड़ा उत्पन्न हुई, तब वे पीड़ासे व्याकुल हो पत्नीके पास आकर इस प्रकार कहने लगे—‘इस परिश्रमसे मेरे सिरमें बहुत पीड़ा हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं अन्धकारमें प्रविष्ट हो रहा हूँ। मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। इस समय मैं तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सोना चाहता हूँ।’ राजन्‌! राजपुत्रीसे ऐसा कहकर सत्यवान् उस समय उसकी गोदमें सो गये। जब सावित्रीकी गोंदमें सिर रखकर सोते हुए सत्यवान्‌के नेत्र निद्रावश मुँद गये, तब उस पतिव्रता महाभागा राजपुत्री सावित्रीने उस स्थानपर आये हुए सामर्थ्यशाली स्वयं धर्मराजको देखा, जो नीले कमलके-से श्यामवर्णसे सुशोभित और पीताम्बर धारण किये हुए थे। वे चमकती हुई बिजलियोंसे युक्त जलपूर्ण मेघ-जैसे दीख रहे थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट और दो कुण्डलोंसे सुशोभित थे। उनके वक्षःस्थलपर हार लटक रहा था। वे बाजूबंदसे विभूषित थे तथा उनके पीछे मृत्युसहित महाकाल भी था। धर्मराजने उस स्थानपर पहुँचकर उस समय सत्यवान्‌के शरीरसे अंगूठेके परिमाणवाले पुरुषको पाशमें बाँधकर अपने अधीन किया और उसे खींचकर शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया। तब आलस्यरहित हो सुन्दरी सावित्री पतिको प्राणरहित देखकर जाते हुए धर्मराजके पीछे-पीछे चली और काँपते हुए हृदयसे अञ्जलि बाँधकर धर्मराजसे बोली—‘माताकी भक्तिसे इस लोक, पिताकी भक्तिसे मध्यम लोक और गुरुकी शुश्रूषासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो इन तीनोंका आदर करता है, उसने मानो सभी धर्मोंका पालन कर लिया तथा जिसने इन तीनोंका आदर नहीं किया, उसकी सारी सत्क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। जबतक ये तीनों जीवित रहें, तबतक किसी अन्य धर्मके पालनकी आवश्यकता नहीं है। उनके प्रिय एवं सुखके कार्योंमें तत्पर रहकर नित्य उनकी शुश्रूषा करनी चाहिये। उनकी आज्ञासे यदि कभी परतन्त्रता भी स्वीकार करनी पड़े तो वह सब मन-वचन-कर्मद्वारा उन्हें निवेदित कर देना चाहिये। पुरुषके सारे कर्म माता, पिता और गुरु—इन्हीं तीनोंमें समाप्त हो जाते हैं॥ १—१४॥